Sunday, July 10, 2011

अठारहवां अध्याय :मोक्ष संन्यास

-मोक्ष सन्यास -तर्के निजात -

अर्जुन ने कहा - 
ऋषिकेश ,फरमाइए अब ज़रा -है संन्यास और त्याग में फर्क क्या , 
कवी दस्त ,केशी के कातिल मुझे -उसूल इनके क्या हैं बता दीजिये II 1 II 
भगवान ने कहा - 
ये कहते हैं दाना कि ख्वाहिश के काम -उन्हें छोड़ने का है संन्यास नाम , 
मगर त्याग में हो न तर्के अमल -करें सब अमल छोड़ कर उसके फल .II 2 II 
कई मर्दे दाना कहें 'छोड़ काम '-कि कर्मों में पिन्हां जरर है मुदाम , 
कई यूं कहें ,ये समादत न जाए -इबादत ,सखावत ,रियाजत न जाए .II 3 II 
मगर मुझसे भारत के सरदार सुन -मेरा कौल मेरे परस्तार सुन , 
कि इस त्याग के भी हैं इकसाम तीन -गुनों से हुए इसके भी नाम तीन II 4 II 
तू यग और सखावत ,रियाजत न छोड़ -ये तीनों हैं एने सआदत न छोड़ , 
कि यग और सखावत रियाजत के काम -करें पाक ,दाना के दिल को मुदाम .II 5 II 
यही फैसला मेरे नजदीक है -यही राय पुख्ता है और ठीक है , 
कि यग और सखावत ,रियाजत भी कर -तआल्लुक रख इनसे ,न फिक्रे समर .II 6 II 
कि जो काम सर पर बरे फर्ज है -न छोड़ उसको ,ये फर्ज इक कर्ज है ,
ये तर्क इक फरेबे जहालत समझ -ये त्याग इक तमोगुन की सूरत समझ .II 7 II 
वो बुजदिल जो तकलीफ के खौफ से -जो करना हैं काम उसे त्याग दे ,
समझ ले रजोगुन वो तर्के अमल -न हासिल हो इस त्याग से कोई फल .II 8 II 
करे फर्ज को फर्ज अगर जानकर -तअल्लुक हो इस से न फिक्रे समर ,
जो असली है ,अर्जुन यही त्याग है -कि एने सतोगुन यही त्याग है .II 9 II 
जो त्यागी सतोगुन है और होशियार -सुलूक अपने कर दे वो तार तार ,
जो हो कारे -नाखुश तो नाखुश न हो -अगर कारे खुश हो जरा खुश न हो .II 10 II 
कि दुनिया में जितने हैं तन के मकीं -करें तर्क सब काम मुमकिन नहीं ,
है त्यागी वही तारीके -बा अमल -अमल जो करे छोड़कर उसके फल .II 11 II 
जो त्यागी नहीं ,जब वो दुनिया से जाए -तो मर कर वो फल तीन सूरत में पाए ,
बुरे या भले या मुरक्कब समर -जो तारिक हैं ,बच जाएँ इनसे मगर .II 12 II 
जबरदस्त अर्जुन समझ मुझ से अब -कि हर काम के पांच होंगे सबब ,
हो पाँचों की तकमील हर काम की -कहे सांख्य का फलसफा भी यही .II 13 II 
सबब अव्वलीं है अमल का मुकाम -दुवम आमिल ,इसका फिर एजा तमाम ,
चहारुम सबब सई ओ तदबीर है -तो पंजम सबब ,दस्ते तकदीर है II 14 II
कोई काम इन्सां जतन से करे -जुबां से कि तन से कि मन से करे ,
र वा काम या नारवा काम हो -इन्हीं पांच से वो सर अंजाम हो .II 15 II
करीने- खिरद फिर नहीं उसकी बात -जो समझे है ,आमिल फकत उसकी ज़ात ,
हकीकत में है वो हकीकत से दूर -वो मूरख है ,दानिश में किसके फितूर .II 16 II
वो इन्सां जो दिल में न रक्खे खुदी -नहीं जिसकी दानिश में आलूदगी ,
नहीं उसको कर्मों के बंधन से काम -वो कातिल नहीं गो करे कत्ले आम .II 17 II
अमल के मुहर्रिक हैं महफूज तीन -वो हैं आमिलो -इल्मो -मालूम तीन ,
वो अजजा है जिनपर अमल का मदार -है कारिन्दा ,ओ कार ओ आलाते कार .II18 II
जो गुन शाश्तर से करे तू नजर -अमल,आमिल और ज्ञान के राज़ पर , 
जो जिस तरह दुनिया में गुन तीन है -यहीं उसके अक्साम सुन ,तीन हैं .II 19 II 
नजर आये जिस ज्ञान से बरमला -हरेक में वही हस्तीये लाफना , 
जो कसरत में वहदत की पहचान है -तो ऐने सतोगुन यही ज्ञान है .II 20 II 
नजर आये कसरत में कसरत अगर -कि सब हस्तियाँ हैं जुदा सरबसर , 
जो कसरत में वहदत से अनजान है -रजोगुन उस इंसान का ज्ञान है.II 21 II 
अगर जुजू में दिल लगाने लगे -इसी जुजू को कुल बताने लगे , 
तो दानिश वो कोतह ,नजर तंग है -तमोगुन इसी ज्ञान का रंग है.22 II 
अमल वो लाजिम है और बेलगाव -न रगबत ,न नफ़रत का जिसमे सुभाव , 
न हो फल की ख्वाहिश का जिसमे खलल -यही है ,यही है सतोगुन अमल.II 23 II 
मगर वो अमल जिसमे फल का हो शौक -रहे लज्जतो कामरानी का जौक , 
खुदी की नुमायश हो और दौड़ धूप -ये समझो अमल का रजोगुन है रूप .II 24 II 
फरेबे नजर से करें काम अगर -न हो फिक्रे इमकानो -अंजाम अगर ,
न हो जिसमे ईजा औ नुकसां पे गौर -तमोगुन अमल के यही बस हैं तौर .II 25 II 
तअल्लुक से बाला खुशी से बरी-इरादे का मजबूत ,दिल का कवी ,
बराबर है जिसके लिए हार जीत -वो आमिल सतोगुन की रखता है रीत .II 26 II 
जो तालिब है फल का हवसनाक है -जो लोभी है ,ज़ालिम है ,नापाक है ,
खुशी से जो खुश हो ,जो गम से मलूल -वो अमिल रजोगुन के बरते उसूल .II 27 II 
जो चंचल कमीना है जिद्दी कि सुस्त -नहीं काम करने में चालाक चुस्त , 
फरेबी ,शरीर और मगमूम है -वो आमिल तमोगुन से मौसूम है .II 28 II 
अयां अक्ले इन्सां के हों तीन गुन -बताता हूँ अर्जुन तवज्जो से सुन , 
हैं गुन अज्मे दिल के भी तीनों यही -ब तफसील सुन मुझ से ले आगही .II 29 II 
हों तर्के अमल ,खैर हो कि हो शर -निजातो असीरी ,दिलेरी कि डर . 
जो फ़र्को तमीज इनमे समझ आयेगी -सतोगुण वही अक्ल कहलायेगी II 30 II 
बताये न जो साफ़ धर्म और अधर्म -रवा कौन है ,ना रवा कौन कर्म , 
तो अर्जुन नही है सतगुन वो अक्ल -है अपने गुनों से रजोगुन वो अक्ल .II 31 II 
घिरी हो अँधेरे में दानिश अगर -जो शर को कहे खैर ,नेकी को शर , 
हरेक बात उलटी ,हरेक में फितूर -तमोगुन वही अक्ल है बिल्जरूर .II 32 II 
अगर योग से अज्म हो इस्तवार-हवासो -दिलो -दम पे हो इख़्तियार , 
तो अच्छा वही अज्म ,अर्जुन समझ -वही अज्मे -रासिख तमोगुन समझ .II 33 II 
मगर अज्म वो जिस में हो शौके ज़र-फ़रायज से मकसूद हो फिक्रे समर , 
हवा ओ हवस से रहे जिस को काम -रजोगुन है इस अज्म का पार्थ नाम .II 34 II 
है वो अज्मे खाली ,जहालत का बाब -रहे आदमी जिस से पाबंदे ख़्वाब , 
बढे खौफो -रंजो -मलालो गुरूर -तमोगुन वही अज्म है बिल्जरूर .II 35 II 
सुन अब मुझसे भारत के सरदार सुन -कि सुख के बी इन्सां में हैं तीन गुन , 
है पहले वो सुख ,जिस से दुख दूर हो -बसर मश्क से जिसकी मसरूर हो .II 36 II 
वो सुख जिसमे हासिल हो दुख से निजात -वो पहले ज़हर फिर हो आबे हयात ,
वो सुख आत्मा के लिए जान ले -सतोगुन है बेशक ये पहचान ले.II 37 II 
जो महसूस से मेल खाकर हवास -मुसर्रत की लज्जत से हों रूशनाश ,
तो पहले वो अमरित है फिर ज़हर है -रजोगुन मुसर्रत की एक लहर है II 38 II 
हो मदहोश इन्सां जिस आराम में -जो धोका है आगाजो अंजाम में ,
बढे मस्ती ओ गफलतो ख़्वाब से -तमोगुन वो सुख है इसे जानले.II 39 II 
जो माया से पैदा हुए तीन गुन -कोई इनसे बाहर नहीं खूब सुन ,
जमीं पर ,फलक पर या हों देवता -नही कोई इन तीन गुन के बिना II 40 II 
बिरहमन हों क्षत्री हो या शूद्र वैश -सुन अर्जुन हरेक का निराला है कैश ,
फ़रायज जुदा ,सबकी खसलत जुदा -कि फितरत ने कि सबकी तबियत जुदा .II 41 II 
सूकूं,जब्त ,उफूये खता ,रास्ती -खिरद ,इल्मो ईमान पाकीजगी ,
रियाजत ,इबादत के पाकीजा कर्म -ये फितरत ने रक्खा बिरहमन का धर्म .II 42 II 
शुजाअत ,सखावत ,तबात और जमाल -खुदावन्दगारी औ फन में कमाल , 
कभी छोड़ जाए न मैदाने जंग -ये होते है क्षत्री की फितरत के रंग .II 43 II 
जो है वैश्य तबअन तिजारत करे -करे गल्लाबानी ज़राअत करे , 
जो है शूद्र ,सबके वो करता है कार -है फितरत से खिलकत का खिदमत गुजार .II 44 II 
अगर अपने अपने करो कारोबार -तो हो जाओगे कामिल अंजामकार ,
अगर फर्ज की अपनी तामील हो -तो सुन क्यों न इन्सां की तकमील हो .II 45 II
वही जात जिस से खुदायी हुई -जो सारे जहाँ पर है छायी हुई , 
उसी की परस्तिश ,इबादत से गर्ज-है तकमील इन्सान पर उसकी फर्ज .II 46 II 
नहीं मंसबी धर्म तेरा अगर जो खूबी से भी कर सके तो न कर , 
जो है धर्म तेरा वो कर काम आप -बुरा हो भला हो नहीं इसमे पाप .II 47 II 
जो है तबई धर्म उसकी तामील कर -जो नाकिस भी हो उनकी तकमील कर , 
कि कामों में अर्जुन जियां साथ है -जहाँ भी है आतिश धुआं साथ है .II 48 II
जो कामों से मन को लगावट नहीं -हवस तर्क हो ,नफ्स जेरे नगीं, 
तो इस तर्क से पाए रुतबा बुलंद -न कर्मों की बाक़ी रहे कैदो बंद .II 49 II 
सुन अब मुख़्तसर मुझसे कुंती के लाल -कि हासिल जो करता है ओजे कमाल , 
वो फिर ब्रह्म से जाके वासिल हो कब -ये अआला तरीं ज्ञान हासिल हो कब .II 50 II 
हो काबू जिसे नफ्स पर मुस्तकिल -करे पाक दानिश में सरशार दिल , 
न आवाजो महसूस से अश्या से काम -वो रगबत से नफ़रत से बाला मुदाम .II 51 II 


जो खाता हो कम और हो खिल्वत नशीं -हों तन ,मन ,जुबां जिसके जेरे नगीं , 
रहे ध्यान और योग में मुस्तकिल -हमेशा हो बैराग में जिसका दिल .II 52 II 
अहंकार उसमे न बल का गुरूर -तकब्बुर ,गजब ,हिर्सो शहवत से दूर , 
खुदी हो बुरी जिसको ,दिल में सुकूं -वही ब्रह्म का वस्ल पाए न क्यूँ .II 53 II 
हो जब वासिले ब्रह्म दिल शाद हो -गमो ,रंजो .उल्फत से आजाद हो , 
जो समझे है मख्लूक यकसां सभी -नसीब उसको भगती हो आला मेरी .II 54 II 
वो भगती से मेरी मुझे जान ले -कि मैं कौन हूँ ,क्या हूँ ,पहचान ले , 
मेरा ज्ञान जब उसको हासिल हुआ -मेरी जाते आली में वासिल हुआ .II 55 II 
करे जिस कदर उसपे लाजिम हैं काम -मगर आसरा मुझ पे रक्खे मुदाम ,
वो रहमत में मेरी समा जाएगा -मुकामे बका को वो पा जाएगा .II 56 II 
तू मुझपर सभी काम सन्यास कर - इन्हें छोड़ ,दिल से मेरी आस कर .
तू ले अक्ल के योग का आसरा -खयालात अपने मुझी में लगा .II 57 II 
अगर मन में मुझको बिठाएगा तू -तो हर रोग से पार जायेगा तू ,
सुनेगा न मेरी अहंकार से -तबाही में जाएगा ,पिन्दार से .II 58 II 
ये कहना तेरा खुद अहंकार है -कि मुझको लड़ाई से इन्कार है ,
ये सब अज्म काफूर हो जाएगा -तू फितरत से मजबूर हो जाएगा .II 59 II 
बनाया है जो तेरी फितरत ने धर्म -कराएगी फितरत वाही तुझ से कर्म ,
तुझे लाख रोके फरेबे ख्याल -करेगा तू नाचार कुंती के लाल .II 60 II 
सुन अर्जुन खुदा है ,खुदा हर कहीं -खुदायी के दिल में खुदा है मकीं ,
वो सब हस्तियों को घुमाता रहे -वो माया का चक्कर चलाता रहे II 61 II 
पनाह अपनी भारत उसी को बना -उसी की इबादत में हस्ती लगा ,
तू रहमत में उसकी समा जाएगा -सुकूनो बका उस से पा जाएगा .II 62 II 
बताया तुझे मैंने अय पाकबाज -ये ज्ञानों का ज्ञान और राजों का राज ,
तवज्जो से इस राज पर गौर कर -अमल इस पे तू चाहे जिस तौर कर .II 63 II 
सुन अब सर्रे -पिन्हाँ की एक औए बात -बड़े राज की काबिले गौर बात ,
कि अर्जुन तू प्यारा है ,महबूब है-तेरा फ़ायदा मुझको मतलूब है .II 64 II 
लगा मुझमे दिल भक्त होजा मेरा -तू कर यग ,मेरे सामने सर झुका ,
मुझे तुझसे ,मुझसे ,तुझे प्यार है -मेरा वस्ल का तुझसे इकरार है.II 65 II 
तू सब धर्म छोड़ और ले मेरी राह -तू मांग आके दामन में मेरे पनाह ,
तेरे पाब सब दूर कर दूंगा मैं -न गमगीं हो ,मसरूर कर दूंगा मैं .II 66 II 
ये राज उस ने मत कह जो जाहिद न हो -ये राज उस से मत कह जो आबिद न हो 
न उस से ,जो हो बद जुबां,नुक्ताचीं -न उस से ,जो सुनने का ख्वाहाँ नहीं .II 67 II 
मेरा भक्त होकर बइज्जो -नियाज -जो भक्तों से मेरे कहेगा ये राज ,
उन्हें सर्रे आली सिखाएगा जो -मेरा वस्ल बे शुबहा पायेगा वो.II 68 II 
कहाँ उस से बढाकर है इन्सां कोई -करे ऎसी प्यारी जो सेवा मेरी ,
मुरव्वत की आँखों का तारा है वो -मुझे सारी दुनिया से प्यारा है वो .II 69 II 
पढेगा जो कोई बराहे सवाब -हमारे मुक़द्दस सवालों जवाब ,
मैं समझूँगा उसने दिया ज्ञान यग -इबादत में मेरी किया ज्ञान यग .II 70 II 
फकत जो सुने दिल में रखकर यकीं-निकाले न ऐब और न हो नुक्ता चीं.,
गुनाहों से वो मुखलिसी पायेगा -कि नेकों की जन्नत में आ जाएगा .II 71 II 
भगवान ने कहा -
सूना तूने अर्जुन ये मेरा कलम -सुना तबये -यकसू से तूने तमाम ,
बता तेरे दिल से धनंजय कहीं ,फरेबे जहालत ,गया कि नहीं .II 72 II 
अर्जुन ने कहा -
पुकारा फिर अर्जुन ने कि अय लाजवाल -हुआ दूर शक और फरेबे ख्याल ,
पता चल गया ,दिल है मजबूत अब -बजा लाऊंगा आपके हुक्म सब .II 73 II 
संजय ने कहा -
सुना मैंने जो श्री कृष्ण ने जो कहा -जो अर्जुन महा आत्मा ने सुना,
अजब हैरत अंगेज थी गुफ्तगू -खड़े हैं मेरे रोंगटे मूबमू .II 74 II 
सुना व्यास जी की दयासे तमाम -ये श्री कृष्ण योगेश्वर का कलाम ,
खुद उनके लबों से सुना है सभी -यही योग आली ,ये सर्रे खफी .II 75 II 
जो जेशव से अर्जुन हुए हम कलाम -अजब गुफ्तगू है मुक़द्दस तमाम ,
उसे याद करता हूँ मैं बार बार -तो दिल शाद करता हूँ मैं बार बार .II 76 II 
हरी की हुई दीद मुझको नसीब -मेरे सामने है वो सूरत अजीब ,
उसे यद् करता हूँ मैं बार बार -तो दिल शाद करता हूँ मैं बार बार .II 77 II 


जिधर हैं कृष्ण मेहरबां-योगेश्वर हैं खुद जहाँ ,
जिधर है साहबे कमाल अर्जुन जैसा पहलवां,
वहीँ हैं शाद कामियां,वहीं खुश इंतजामियाँ,
वहीं हैं कामरानियाँ वहीं है शादमनियां .II 78 II 


-अठारहवां अध्याय समाप्त -


:-ॐ तत सत इति :-
























सत्रहवां अध्याय :श्रद्धात्रय विभाग

श्रद्धात्रय विभाग -ऐतकादे सहगाना - 

अर्जुन का सवाल - 
जो यग करने वाले हैं ,अहले यकीं-मगर शाश्तर पर जो चलते नहीं , 
तो फरमाइए वो सतोगुन पे हैं -कि आमिल रजोगुन,तमोगुन पे हैं .II 1 II 
भगवान का जवाब - 
कहा सुन के भगवान ने ये सवाल -मुताबिक है फितरत के ईमां का हाल , 
कि ईमां के अन्दर भी हैं तीन गुन-सतोगुन ,रजोगुन ,तमोगुन तू सुन .II 2 II 
कि जो जिसकी फितरत का आहंग है -वही उसके ईमां का रंग है , 
कि इंसां खुद ईमां की तफ़सीर है -अकीदा ही इन्सां की तस्वीर है.II 3 II 
सतोगुन तो पूजें ,खुदा ही को बस -राजोगुन मगर यक्ष और राक्षस , 
तमोगुन के बन्दे है ,सबसे अलग -कि वो भूत प्रेतों को देते हैं यग.II 4 II 
जो ताप में उठाते हैं रंजो -तनब-उलट शाश्तर के करें काम सब , 
वो मक्कार ,खुदबीं हैं और सख्तकोश-भारी उनमे है ,कुव्वते-हिर्सो जोश .II 5 II 
करें वो दुखी पांच तत का बदन -मुझे भी ,जो इस तन में हूँ खेमाजन , 
बजाहिर तो हर चन्द इन्सां है वो -जो अज्म देखो तो शैतां है वो.II 6 II 
गिज़ा जिसके शायक हैं सब ,उसकी सुन -करें फर्क इसमे यही तीन गुन ,
यही गुन इसी तरह देंगे बदल -इबादत ,रियाजत ,सखावत के फल .II 7 II 
गिज़ा जिस से सेहत हो और जिंदगी -बढे जोशो ताकत ,खुशी खुर्रमी ,
मुकव्वी हो ,पुर रोगन ,और खुश गवार -सतोगुन के शायक को है उस से प्यार .II 8 II 
सलोनी हो ,खट्टी कि कड़वी गिज़ा -जली ,चटपटी ,गर्म या बे मजा ,
गिज़ा ऎसी खाएं रजोगुन के लोग -उन्हें रंज हो ,दुख हो ,या तन का रोग .II 9 II 
जो बासी हो ,बूदार गंदी गिज़ा -जो बदजायका हो या जूठी गिज़ा ,
ये खाना तमोगुन के बन्दों का है -कि खाना जो गन्दा है ,गंदों का है.II 10 II 
वही है सतोगुन का यग बिल्जरूर -न हो फल की ख्वाहिश का जिसमे फितूर ,
अमल शाश्तर की रिआयत से हो -इबादत ,इबादत की नीयत से हो .II 11 II 
अगर यग किया फल की ख्वाहिश के साथ -ख्याले नुमूदो -नुमायश के साथ ,
तो,अर्जुन नहीं ये सतोगुन का यग -रजोगुन का है ,ये रजोगुन का यग .II 12 II 
जो करते हैं यग शाश्तर के खिलाफ -न अन्नदान ,जिसमे न मंतर हों साफ ,
न हो दक्षिणा ,औं जौके -यकीं -तमोगुन के यग के सिवा कुछ नहीं.II 13 II 
जो पूजा करे देवताओं की तू-बिरहमन हों ,आलिम हों ,या हों गुरू ,
अहिंसा ,तजर्रुद,सफा ,रास्ती -बदन की रियाजत यही है ,यही II 14 II
सुखन वो जो सच्चा हो ,और बे खरोश -मुफीदे खलायक हो ,फिरदौस -कोश,
मुक़द्दस कुतब की तिलावत मुदाम -जुबां की रियाजत इसी का है नाम .II 15 II
सुकूं दिल में हो ,लब पे हो खामुशी-हलीमी ,ख्यालों में पाकीजगी , 
रहे नफ्स पर जब्त और दिल हो राम -इसी शै का मन की रियाजत है नाम .II 16 II 
जो यकदिल ,यकीं से इबादत करे -वो तन ,मन जुबां से रियाजत करे , 
न हो फल के ख्वाहिश पे आमादगी -सतोगुन की रियाजत यही है ,यही .II 17 II 
रियाजत दिखावे की गर मन को भाए -कि लोगों में इज्जत हो ,पूजा कराये , 
रियाजत वो चंचल है ,नापायदार -कर इसको रजोगुन -रियाजत शुमार .II 18 II 
वो तप जिस में जिद्दी उठाता है कष्ट -वो तप जिसका मकसद हो औरों का कष्ट , 
जहालत का तप का तप उसको गिरदान तू-तमोगुन रियाजत इसे मान तू .II 19 II 
इसे जानकर फर्ज खैरात दें -जो हकदार हो ,जिस से खिदमत न लें , 
मुनासिब हो वक्त और मौजूं मुकाम -सतोगुन सखावत इसी का है नाम .II 20 II 
हो अहसां के बदले की ख्वाहिश अगर -सखावत में फल पर लगी हो नजर , 
अगर बेदिली से कोई दान दे -रजोगुन सखावत उसे जान ले .II 21 II 
अगर नामुनासिब है वक्त और मुकाम -उसे दान दें जिसको देना हराम , 
जो ले उसकी जिल्लत करें ,दिल दुखाएं -तमोगुन सखावत उसी को बताएं .II 22 II 
जो है "ॐ तत्सत "मुक़द्दस कलाम -सह गूना है ये ब्रह्म का पाक नाम , 
इसी से बिरहमन हुए आशकार -इन्हीं से हुए यग्ग और वेद चार .II 23 II 
इबादत ,सखावत ,रियाजत के काम -मुवाफिक जो हैं शाश्तर के तमाम , 
वो सब ब्रह्म दां-मर्दुमे -पारसा -हमेशा करें ॐ से इब्तिदा .II 24 II 
जहां में है मतलूब जिसको निजात -समर से नहीं कुछ इसे इक्तिफात , 
इबादत रियाजत ,सखावत करे -मगर हर्फे "तत"मुंह से पहले कहे .II 25 II 
हकीकत यही है ,हकीकत है "सत"-सदाकत यही है सदाकत है "सत " , 
कि दुनिया में जो भी भला काम है -सुन अर्जुन कि उसका "सत "नाम है .II 26 II 
यही सत समझ उस अकीदत को जो -इबादत ,रियाजत ,सखावत में हो , 
करें उस खुदा के लिए जोभी काम -तो उस काम का भी यही "सत "है नाम .II 27 II 
हवन .दान में हो अकीदत न शौक -रियाजत में ईमां ,अमल में न जौक ,
इन अफआल का फिर "असत "नाम है -यहाँ है न उनका वहां काम है .II 28 II 


-सत्रहवां अध्याय समाप्त -













सोलहवां अध्याय :दैवासुर संपत्ति

-दैवासुर संपत्ति -सिफ़ाते मलकूती व् शैतानी - 

भगवान ने फरमाया -
सुन अर्जुन है क्या देवताई सिफात -दिलेरी ओ इल्मो अमल में सबात ,
सखा ,जब्त ,यग,दिल में पाकीजगी -तिलावत ,रियाजत ,सलामत रवी .II 1 II 
अहिंसा ,सदाकत ,करम ,तर्के ऐश -न फितरत का चंचलपना और न तैश ,
दिले बेहवस ,पुर सुकूं ,तबअ नर्म -न दिल तंग होना ,निगाहों में शर्म .II 2 II 
सबूरी ,सिफ़ा ,जोर ,उफूये खता -हसद से तकब्बुर से रहना जुदा ,
जब इन नेक वस्फों पे मायल है वो -तो इन्सां फरिश्तानुमा कुल है वो .II 3 II 
दोरंगी गुरूर ,औ नुमायश ,गजब -सुखन तल्ख़ ,बातें जहालत की सब , 
इन्हीं से उस इंसान की पहचान है -सदा सेजो   फितरत का शैतान है.II 4 II 
है नेकू खसायल,रिहायी पसंद-शयातीं की खसलत से है कैदो बंद , 
तुझे रंजो गम क्या ,पांडू के लाल -कि फितरत से तू है फ़रिश्ता खिसाल .II 5 II 
ज़माने में जितने भी इन्सां हुए -फ़रिश्ते कोई ,कोई शैतां हुए , 
सुना है मुफस्सिल फरिश्तों का हाल-जो शैतां हैं ,सुन अब उनका हाल .II 6 II 
खबासत के पुतले हैं इन्हें क्या तमीज -ये करने की चीज ,या न करने की चीज , 
न सत इनके अन्दर ,न पाकीजापन -मुअर्रा है शाइस्तगी से चलन .II 7 II 
वो कहते हैं झूठा है संसार सब -न है इसकी बुनियाद ,न कोई रब , 
करें मर्दों जन मिलके जब मस्तियाँ -उन्हीं मस्तियों से हों ,सब हस्तियाँ .II 8 II 
जो हैं इन ख्यालों के बद्कुन बशर -वो खूंखार ,बेरूह ,कोतह नजर , 
उदू बन के दुनिया में आते रहें -जहां में तबाही मचाते रहें .II 9 II 

तकब्बुर ,रिया और बनावट से काम -वो तस्कीं न पायें हवस की गुलाम , 
वो खाएं फरेबे ख्यालाते बद-बड़ी में दिखाएँ सदा शद्दो -मद .II 10 II 
गेम बेहिसाब उनको ,दिन हो कि रात -मिले फिक्रे-दुनिया से मर कर निजात , 
है मकसूद इनका ,हवस रानियां-हैं मद्दे नजर ऐश की सामानियाँ .II 11 II 
उमीदों के फंदों में अटके हुए -गजब और शहवत में लटके हुए , 
बदी से वो दौलत कमाते रहें -जो ऐशो तरब में गंवाते रहें .II 12 II 
वो कहता है 'आज एक पायी मुराद -तो कल दूसरी हाथ आये मुराद , 
ये दौलत है मेरी ,ये धन है मेरा -मेरे पास ही ये रहेंगे सदा II 13 II 
किया एक दुश्मन को मैंने हलाक -करूंगा मैं औरों को जेरे ख़ाक , 
सुखी हूँ ,कवी ,हाकिमे पुर जलाल -मजे ले रहा हूँ ,कि हूँ बा कमाल .II 14 II 
मैं धनवान ,मेरा घराना शरीफ -भला कौन होता है मेरा हरीफ , 
मैं लूंगा मजे यग्य और दान से -'यहीं खाए धोका वो अज्ञान से .II 15 II 

ख्यालों के फंदों में जकडे हुए -तवह्हुम के जालों में पकडे हुए , 
तअय्यश से जी को लगाते हैं वो -तो नापाक ,दोजख में जाते हैं वो .II 16 II 
वो मगरूर ,जिद्दी हैं ,और ख़ुदपरस्त-वो दौलत ने नश्शे में रहते हैं मस्त , 
जो करते हैं यग तो भी बहरे नुमूद -नहीं हैं वो पाबन्दे रस्मो -कुयूद .II 17 II 
वो गुस्ताख ,पुर कीना ओ पुर गुरूर -खुदी मस्तियो तैशो -ताकत में चूर , 
मैं खुद उनंके तन में हूँ ,या गैर के -न खैर उनसे पहुंचे ,सिवा बैर के .II 18 II 
ये हासिद ,कमीने जफाकार लोग -ये जिल्लत के पुतले ,ये खूंखार लोग ,
न जिल्लत से इनको निकालूँगा मैं -शिकम में शयातीं के डालूँगा मैं .II 19 II 
शिकम में शयातीं के होकर मकीं -ये बहके हुए मुझ तक आते नहीं ,
ये ,अर्जुन जनम पर जनम पायेंगे -ये गिरते ही .गिरते चले जायेंगे .II 20 II 
जहन्नुम के हैं तीन दर लाकलाम -तमा ,शहवत और गुस्सा हैं जिनके नाम ,
इन्हें छोड़कर ,इनमे न जाना कभी -न हस्ती को अपनी मिटाना कभी .II 21 II 
जो इनसे बचे वो रहे बे खतर-तमोगुन को जाते हैं ये तीन दर ,
मिले उसको आनंद ,कुंती के लाल -उसी को मयस्सर हो ओजे -कमाल .II 22 II 
जो इन्सां चले शाश्तर के खिलाफ -हवस के हो ताबिअ करे इन्हाराफ ,
मिले उसको राहत ,न ओजे कमाल -रहे दूर उस से मुकामे विसाल .II 23 II 
फकत शाश्तर को बना रहनुमा -कि करना है क्या ,और न करना है क्या ,
बस अब धर्म पर दिल दिए जा तमाम -अमल शाश्तर पर किये जा मुदाम .II 24 II 

-सोलहवां अध्याय समाप्त -







Saturday, July 09, 2011

पन्द्रहवांअध्याय :पुरुषोत्तम योग

-पुरुषोत्तम योग -जाते बरतर - 

भगवान ने फरमाया -
सुन अब ऐसे पीपल का अर्जुन बयां-जड़ें जिसकी ऊपर तने डालियाँ . 
शजर लाफना ,जिसके पत्ते हैं वेद-वो है वेद दां ,पाए जो इसका भेद .II 1 II 
गुनों से बढ़ें डालियाँ ला कलाम -हैं अश्याये -महसूस गुंचे तमाम , 
जड़ें इसकी इन्सां की दुनिया तक आयें -जकड़ कर इसे कर्म से बाँध जाएँ .II 2 II 
तसव्वुर में शक्ल इसकी आये कहाँ -न अव्वल ,न आखिर न जड़ का निशां , 
जड़ें इसकी मजबूत हैं चार सू -ब शमशीरे तजरीद से काट तू .II 3 II 
इन्हें काट कर ढूँढ़ फिर वो मुकाम -जहां जाके फिर तू न लौटे मुदाम , 
तू कह मुझको परमेश्वर की अमां -किया जिसने हस्ती का दरिया रवां.II 4 II 
फरेबो तकब्बुर से पाकर निजात -हवस छोड़कर जो रहे महवे जात , 
तअल्लुक न सुख दुख के इज्दाद हों -मुकामे अबद पाके दिलशाद हों .II 5 II 
जले महरो मह की न मशअल वहां -न हो उस जगह आग शोला फिशां , 
मुकामे मुअल्ला मेरा है वही -पहुँच कर जहाँ से न लौटे कोई .II 6 II 
मेरी आत्मा ही का जरदे कदीम -बने रूह अहले जहाँ में मुकीम , 
जो माया में लिपटे हैं अहले हवास -यही रूह खींचे उन्हें अपने पास II 7 II 
जहां ,ईश्वर यानी जीव आत्मा -हो इक तन में दाखिल और इक से जुदा , 
तो साथ अपने लेजाये मन और हवास -सबा जैसे लेजाये फूलों की बास.II 8 II 
जुबां,कान ,रस , आँखऔर नाक से -इन्हीं पांच ,और मन के इदराक से , 
यही रूह लज्जत उडाती रहे -सदा लुत्फे -महसूस पाती रहे .II 9 II 
मुसाफिर जो आया और आ कर चला -जो लुत्फ़ इन गुनों का उठाकर चला , 
नहीं उसको गुमराह पहचानते-हैं अहले बसीरत फकत जानते II 10 II 
जो योगी रियाजत में कोशां रहें -तो वो भी उसे रूह में देख ले , 
वो मूरख है ,कमजोर जिनके शऊर -करें लाख कोशिश ,न पायें वो नूर.II 11 II 
ये सूरज की ताबिश मेरा नूर है -जहाँ जिसके जलवों से मामूर है , 
रहे चाँद रख्शां मेरे नूर से -तो आतिश दरख्शां मेरे नूर से .II 12 II 
जमीं को जो करता हूँ ,खुद को निहां -तो कुव्वत से मेरी मिले कुव्ते जां , 
बनूँ नूरे महताब की आब मैं -तो करता हूँ पौधों को शादाब मैं .II 13 II 
हरारत हूँ मैं ही ,शिकम में निहां -मैं हूँ जान वालों के तन में तवां , 
दरूनो -बरूं दम में आता हूँ मैं -तो चारों गिजायें पचाता हूँ मैं .II 14 II 
हर इंसान के दिल में पिन्हाँ भी मैं -कि हूँ हाफिजा -इल्म ,निसयाँ भी मैं , 
मैं दाना हूँ ,रौशन हैं सब मुझपे वेद-है वेदान्त मुझसे ,मैं वेदों का भेद .II 15 II 
जहाँ में हैं दो तरह की हस्तियाँ -है फानी कोई और कोई जाविदां ,
जहाँ की है मख्लूक फानी तमाम -अजल से जो बाकी है उसको दवाम .II 16 II 
वो परमेश्वर है ,वो परमात्मा -जो है सब पे छाया हुआ लाफना ,
है बाक़ी ओ फानी से बाला ओ हक़ -कि कायम हुए जिस से तीनों तबक .II 17 II 
जो फानी है ,जात उनसे मेरी बुलंद -जो बाकी है बात उनसे मेरी बुलंद ,
है पुरषोत्तम अपना ज़माने में नाम -यही नाम लें वेददां और अवाम .II 18 II 
जो पुरुषोत्तम इस तरह जाने मुझे -दिले हक़- निगर से जो जाने मुझे ,
तो भारत समझ बा खबर है वही -वो तन ,मन से करता है भगती मेरी .II 19 II 
सिखाया तुझे भारत अय पाकबाज-ये इल्मों का इल्म और राजों का राज ,
जो समझे इसे साहबे होश हो -फ़रायज से अपने सुबुकदोश हो .II 20 II 


-पन्द्रहवां अध्याय समाप्त -










Friday, July 08, 2011

चौदहवाँ अध्याय :गुणत्रय विभाग

-गुणत्रय विभाग -तकसीमे सिफ़ाते सहगाना - 

भगवान का इरशाद -
फिर अर्जुन से भगवान बोले कि,सुन -जो ग्यानों का है ज्ञान सुन उसके गुन ,
मुनी जिसको ये ज्ञान हासिल हुआ -कमले फजीलत से वासिल हुआ .II 1 II 
जो लेते हैं इस ज्ञान का आसरा -वो यकरंग हो जाएँ मुझसे सदा ,
जो पैदा हो दुनिया ,तो आयें न वो -फना हो तो तकलीफ पायें न वो II 2 II 
शिकम है मेरी कुदरते कामिला -जो मैं तुख्म डालूं तो हो हामिला ,
यही है महाब्रह्म अस्ले हयात -कि भारत इसी से हो कायनात .II 3 II 
किसी पेट से कोई पाए जनम -हो अर्जुन कोई शक्ल ,कोई शिकम , 
शिकम है महाब्रह्म ,मैं बाप हूँ -कि बीज उसमे डालता आप हूँ .II 4 II 
नमूदार माया से हों तीन गुन-सतोगुन,रजोगुन,तमोगुन ये सुन , 
जो है लाफना रूह तन में मकीं -ये गुन कैद करते हैं उसको वहीं .II 5 II 
सतोगुन की फितरत है पाकीजा नूर -न ऐब इसमे ,अर्जुन न कोई कुसूर , 
करे रूह को शौके -राहत से कैद -करे रूह को जौके -दानिश का सैद .II 6 II 
रजोगुन की फितरत है जज्बात की -है संगीत से इसकी और तिश्नगी ,
ये जौके अमल का बनाती है जाल -करे रूह को कैद ,कुंती के लाल .II 7 II 
तमोगुन जहालत की औलाद है -कब इस से मकीं ,तन से आजाद है ,
करे कैद धोके से भारत इसे -करे ख्वाबो -गफलत से गारत इसे .II 8 II 
सतोगुन का रहता है सुख से लगाव -रजोगुन का शौके अमल है सुभाव ,
तमोगुन का परदा पड़े ज्ञान पर -तो गफलत मुसल्लत हो इंसान पर .II 9 II 
सतोगुन का जिस वक्त बाला हो दस्त -रजोगुन ,तमोगुन रहें उस से पस्त ,
रजस से सतोगुन ,तमोगुन दबे -तमस से ,सतोगुन ,रजोगुन घटे .II 10 II 
बदन है मकां ,और हवास इसके दर -अगर दर है रौशन तो रौशन है घर ,
अगर ज्ञान का नूर हो जूफिशाँ-सतोगुन के गल्बे का है ये निशाँ .II 11 II 
रजोगुन का गलबा हो अर्जुन अगर -तो हो जाएँ हिर्सो -हवा जोर पर ,
तमन्ना हो ,कोशिश हो ,और पेचो -ताब -राजे शौक किरदार में इज्तिराब.II 12 II 
तमोगुन जब इन्सां में हो जोर पर -तो हो मोह गालिब ,कुरु के पिसर ,
अँधेरा तबीयत पे छा जाएगा -जमूद उसको गाफिल बना जाएगा II 13 II 
सतोगुन जो ग़ालिब हो इन्सान पर -इसी हाल में मौत आये अगर ,
मकीं तन का पाए पवित्तर मुकाम -वो सिद्धों की दुनिया में जाए मुदाम .II 14 II
रजोगुन में इन्सां अगर जान दे -जनम अहले किरदार में आके ले ,
तमोगुन में मर कर जो जिन्दों में आये -दरिदों ,परिंदों ,चरिन्दों में आये .II15 II
जो करता है इन्सां सतोगुन अमल -तो पाता है ,पाकीजा और नेक फल , 
रजोगुन अमल से मिले पेचो -ताब -तमोगुन अमल में ,जहालत का बाब .II 16 II 
सतोगुन से इरफां का पैदा हो नूर -रजोगुन से हिर्सो -हवा का जहूर , 
तमोगुन से धोका भी ,गफलत भी हो -तबीयत पे ग़ालिब ,जहालत भी हो .II 17 II 
सतोगुन से जाएँ सूए आसमां-रजोगुन से लटके रहें दरमियाँ , 
तमोगुन का गुन है ये सबसे रजील -ये पस्ती दे डाले ,ये कर दे रजील .II 18 II 
जो अहले बसीरत हैं अहले नजर -गुनों को समझते हैं कारगर , 
मुझे मानते हैं गुनों से बुलंद -तो वासिल मुझी से हों वो अर्जमंद II 19 II 
बदन का है तीनों गुनों पर मदार -मकीने बदन ,गर करे इनको पार , 
वो चहकता है अमृत ,वो पाटा है सुख -न जीना ,न मरना ,न पीरी का दुख.II 20 II 
अर्जुन का सवाल - 
फिर अर्जुन ने पूछा कि अय कर्दगार-वो इन्सां जो जाता है ,तीनों से पार , 
चलन क्या है उसका ,अलामात क्या -वो तीनों गुनों से हो क्योंकर रिहा .II 21 II 
भगवान का इरशाद -
सुन अर्जुन ,सतोगुन से हासिल हो नूर -रजोगुन से कुव्वत ,तमस से फितूर ,
है कामिल जिसे इनकी चाहत नहीं -जो हों ,तो उसे उनसे नफ़रत नहीं II 22 II 
जो इन्सां गुनों से रहे बेगरज-न बेकल हो इनसे ,न रक्खे गरज ,
जो समझे कि करते हैं गुन ही ये काम -रहे पुर सुकूं खुद में कायम मुकाम .II 23 II 
जो सुख दुख में यकसां ,जो है मुस्तकिल -बराबर जिसे जर हो ,कि मिट्टी की सिल ,
मुसावी पसंदीदा और नापसंद -हो तहसीं कि नफ़रत ,वो सब से बुलंद .II 24 II 


न जिल्लत की परवा ,न इज्जत की भूक -करे दोस्त -दुश्मन से यकसां सलूक ,
गरज त्याग दे ,मुझपे सब कारोबार -समझ लो गुनों से वो होता है पार .II 25 II 
जो खादिम मेरा ही परस्तार है -जो मेरी ही मस्ती में सरशार है ,
हो तीनों गुनों से न क्यों पार वो -है वसले -खुदा का सजावार हो .II 26 II 
मेरी ज़ात ही ब्रह्म का है मुकाम -सबातो बका मुझी में कयाम .
मैं दीने अजल का भी हूँ आसरा -मेरी जाते आली ,मैं राहत सदा .II 27 II 


-चौदहवाँ अध्याय समाप्त -