Wednesday, June 22, 2011

पांचवां अध्याय :कर्मसंयास योग


-   कर्मसंयास -तर्के अमल 

अर्जुन ने कहा - 
कभी कर्मयोग आप अच्छा बताएं -कभी कर्म संन्यास के गुन गिनाएं , 
है भगवान कौन इनमे मरगूबतर -अमल है ,कि तर्के अमल खूबतर .II 1 II 
भगवान का जवाब - 
कही सुन के भगवान ने फिर ये बात -है तर्क ,और अमल दौनों राहे निजात , 
फजीलत में है लेकिन बढ़कर अमल -कि तर्के अमल से है बेहतर अमल.II 2 II 
सदा संनियासी उसे जानिये -हो नफ़रत किसी से न रगबत जिसे , 
मुकय्यद न पाबन्दे इज्दाद है -सुन अर्जुन वही मर्दे-आजाद है.II 3 II 
वो हैं तिफ्ले नादाँ जहालत में गर्क -जो संन्यास और योग में पायें फर्क , 
जो दौनों से इक में भी कामिल हुआ -तो फल उसको दौनों का हासिल हुआ. II 4 II 
तुम्हें सांख्य से जो मिलेगा मुकाम -वही योग से पायेगा लाकलाम . 
जरा देख रखना ,अगर आँख है -वही योग है और वही सांख है .II 5 II 
रहे -योग से जो किनारा करे -तो मुश्किल है संन्यास पाना उसे , 
मुनी ,योग ही में जो कामिल हुआ -विसाले -खुदा उसको हासिल हुआ .II 6 II 
जो सरशार हैं योग में मुस्तकिल -हवास उनके बस में हैं ,वो साफ़दिल,
जिसे जान अपनी सी हर जान है -कहाँ उसको कर्मों से नुकसान है .II 7 II 
हकीकत का है जिसको इल्मो -यकीं -समझता है 'मैं कुछ करता नहीं ,
सुने, देखे ,छूए ,कभी सूँघ ले -वो खाए ,फिरे ,साँस ले ,ऊंघ ले .II 8 II 
वो दे ,और ले ,और बोले कभी -कभी आंख मूंदे तो खोले कभी ,
मगर वो हमेशा ये कर ले कयास -कि 'महसूस की सैर देखें हवास .II 9 II 
रहे बे तअल्लुक करे जब अमल -खुदा ही की खातिर करे सब अमल ,
खता से हमेशा रहेगा बरी-कमल के न पत्ते पे ठहरे तरी .II 10 II 
जो योगी है करते हैं निष्काम काम -नहीं कम में कुछ लगावट का नाम ,
लगाएं वो तन ,मन ,खिरद और हवास -कि दिल की सफाई से हों रूशनास.II 11 II 
जो योगी है ,सरशार छोड़ेगा फल -सुकूने -अबद लायें उसके अमल .
जो योगी नहीं ,वो हवस का फकीर -रहे फल की खाहिश में हरदम असीर .II 12 II 
ये नौ दर की इक राजधानी है तन -रहे चैन से जिसमे शाहे बदन , 
करे खुद न ,कोई औरों से काम -करे तर्क एमाल दिल से मुदाम .II 13 II 
वो मालिक ,अमल और न आमिल बनाए -न कर्मों को कर्मों के फल से मिलाये , 
ये माया की हैं कार फरमाइयां -ये मया ही करती है सबकुछ अयाँ.II 14 II 
न लेगा किसी से भी परमात्मा -किसी की निकोई किसी की खता , 
जहालत है इरफां पे छाई हुई -तो दुनिया है चक्कर में आई हुई .II 15 II 
मगर जिनको हासिल है इरफां का नूर -करे ज्ञान उनकी जहालत को दूर ,
कि सूरज हो जब ज्ञान का जू फिशां-तो परमात्मा की हो सूरत अयाँ .II 16 II 
जो दें रूह और अक्ल ,इसमे लगा -उसी में हों कायम ,उसी पर फ़िदा ,
पूंछ जाये उस तक तो वापिस न आयें -करे ज्ञान दूर उनकी सारी खताएं .II 17 II 
जो ज्ञानी है ,यकसां नजर उसको आय -वो हाथी हो, कुत्ता हो ,या कोई गाय ,
वो हो बिरहमन आलिमो बुर्दबार -कि चंडाल ,नापाक मुरदार ख्वार .II 18 II 
मुसावत में दिल लगाए हुए -जमम पर वो काबू है पाए हुए , 
वो बेऐब ओ यकसां जो जाते खुदा -रहे जात में उसकी कायम सदा .II 19 II 
वो आरिफ खुदा में रहे इस्तवार-न उलझन उसे हो ,न दिल बेक़रार , 
मुसर्रत जो पाए तो शादाँ न हो -मुज़र्रत जो पहुंचे ,परेशां न हो .II 20 II 
न अश्याये जाहिर से उसको लगन -है आनंद से आत्मा में मगन , 
जिसे ब्रह्मयोग से ही सरोकार है -दवामी मुसर्रत में सरशार है. II 21 II 
तअल्ल्लुक से पैदा जो होता है सुख -उसी से नुमायाँ हो आखिर में दुख,
जो सुख का भी आगाज़ो अंजाम है -तो दाना कहाँ उस से खुशकाम है .II 22 II 
न छोड़ा अभी जिसने तन का कफस -मर कर लिए ज़ेर तैशो हवस ,
असीरे बदन रह के ,आजाद है -तो इन्सां वो योगी है दिलशाद है .II 23 II 
वो योगी रहे जिसके दिल में सुरूर -मुसर्रत हो मन में तो सीने में नूर ,
समझ लीजिये हक़ से वासिल उसे -कि हो ब्रह्मनिर्वाण हासिल उसे .II 24 II
ऋषि,मिट गए जिनके जुर्मो कुसूर -जिन्हें खुद पे काबू ,दुई से जो दूर ,
जो सबकी भलाई के खाहाँ रहें -मिले ब्रह्म निर्वाण आखिर उन्हें .II 25 II 
न गुस्सा है जिनमे न रंगे हवस -ख्यालो -तबीअत पे है जिनका बस ,
मिला आत्मा का जिन्हें ज्ञान है -उन्हें हर तरफ ब्रह्म निर्वान है .II 26 II 
मुनि जो न महसूस से दिल लगायें -मियाने -दो अब्रू नजर को जमायें ,
बुरूं और दरूँ के बराबर हों दम -मसावी चले नाक से जेरो बम .II 27 II 
हवासो -दिलो अक्ल कर ले जो राम -तलाशे -निजात ,उसका दिन रात काम,
न डर है ,न गुस्सा ,न लालच कभी -निजात उस मुनी को मिले बिल यकीं .II 28 II 
मुझे शाहे अर्जो-समां जो कहे -जो समझे है यग,तप,मेरे ही लिए 
जो मने मुझे खल्क का गमगुसार -उसी को मिलेगा सुकूनो करार .II 29 


   -पांचवां अध्याय समाप्त -

















Monday, June 20, 2011

चौथा अध्याय .ज्ञानंकर्म सन्यास


 - ज्ञानकर्म संन्यास -आरिफाना तर्केअमल -

भगवान ने फरमाया - 
यही योग जिसको नहीं है फ़ना -विवस्वान को मैंने पहिले दिया . 
मनू ने लिया फिर विवस्वान से -मनू से लिया इसको इक्ष्वाक ने .II 1 II 
यही नस्ल दर नस्ल आया है योग -यही राज ऋषियों ने पाया है योग . 
मगर अब है दौरे जहाँ में ये हाल -कि इस योग को आगया है जवाल.II 2 II 
यही योग का आज राजे -कदीम -बताया है मैंने तुझे अय नदीम. 
किया तुझ पे सर्रे ख़फ़ी आशकार -कि तू भक्त मेरा है ,और दोस्तदार .II 3 II 
अर्जुन का सवाल -
कहा सुनके अर्जुन ने सुनिए हुजूर -जहाँ में हुआ आपका अब जहूर .
विवस्वान पहिले ही मौजूद था -तो योग आपसे उसने क्योंकर लिया .II 4 II 
भगवान ने कहा -
सुन अर्जुन हुए हैं यहाँ बार बार -तुम्हारे हमारे जनम बेशुमार .
मुझे हाल इन सबका मालूम है -तेरा हाफिजा इन से महरूम है.II 5 II 
मेरी ज़ात है मालिके कायनात -न इसको विलादत न इसको ममात .
जो काम अपनी फितरत को लाता हूँ मैं -ज़हूर अपनी माया से पाता हूँ मैं .II 6 II 

तनज्जुल पे जिस वक्त आता है धर्म -अधर्म आके करता है बाज़ार गर्म .
ये अंधेर जब देख पाता हूँ मैं -तो इन्सां की सूरत में आता हूँ मैं .II 7 II 
भलों को बुरों से बचाता हूँ मैं-बुरों को जहाँ से मिटाता हूँ मैं .
जड़ें धर्म की फिर जमाता हूँ मैं -अयाँ होके युग युग में आता हूँ मैं .II8 II 
जो अर्जुन समझ ले इन इसरार को -खुदायी जनम और किरदार को .
वो मर कर मेरे वस्ल से शाद है -तनासुख के चक्कर से आज़ाद है.II 9 II 
कई मह्व मुझ में मुझी में मुकीम -तअल्लुक से आजाद बे रंजो बीम , 
सदा ज्ञान ,ताप से करें पाक दिल -मेरी जाते आली में जाते हैं मिल.II10 II 
मेरे पास जिस राह से लोग आयें -वो राजी हों ,अर्जुन मुराद अपनी पायें , 
इधर से चलें ,या उधर से चलें -मेरे सब हैं रस्ते जिधर से चलें .II 11 II 
वो कर्मों के फल के तालिब यहाँ -करें देवताओं की कुर्बानियां , 
कि फिल्फौर दुनियां में इन्सान की-मुरादें हों कर्मों से हासिल सभी .II 12 II 
बनाये हैं मैंने जो ये वर्ण चार -कि कर्मों ,गुणों की तकसीमे कार. 
मैं खालिक हूँ इनका ,मगर बिल्जरुर -अमल से बरी हूँ ,तगय्युर से दूर .II 13 II 
न कर्मों का होता है मुझ पर असर-न कर्मों के फल पर है मेरी नजर . 
जो ऐसा समझता मुझे पाक है -वो कर्मों के बंधन से बेबाक है .II 14 II 
सुलफ के बुजुर्गों से पाकर ये बात -किये काम दुनिया में बहरे निज़ात. 
इसी तरह तू भी किये जा अमल-बुजुर्गों के नक़्शे कदम पे ही चल.II 15 II
सुन अब मुझसे कर्मों अकर्मों का राज़ -न दाना भी जिनमे करें इम्तियाज़ . 
बताता हूँ कर्मों का रस्ता तुझे -जो आज़ाद कार देगा संसार से .II 16 II 
ये लाजिम है कर्मों को पहचान तू -बुरे कर्म जो हैं उन्हें जान तू. 
अकर्मों से कर्मों को करले जुदा -कि गहरा है कर्मों का रिश्ता बड़ा .II 17 II 
वो इन्सां जो कर्मों में देखे अकर्म -अकर्म उसको आये नज़र ऐन कर्म . 
वो लोगों में दाना है और होशियार -वो योगी है ,गो सब करे कारोबार .II 18 II 
न खाहिश कि हो काम में जिसके लाग -जला दे अमल जिसके इर्फाँ की आग . 
अमल में समर से जो है बेनियाज़ -है दाना वही पेशे दानाए राज़ .II 19 II 
अमल में नहीं जिसको फल से लगन -दिले मुतमइन में रहे जो मगन . 
सहारा किसी का न ले एक पल -अमल उसका है ,ऐन तर्के अमल .II 20 II 
उमीदो हवस से न है कुछ लगन -जो काबू है मन तो कब्जे में तन . 
जो तन काम में ,मन रहे ध्यान में -तो पल भी न गुजरेगी असियान में .II 21 II 
जो मिल जाये लेकर वही शाद है-न हासिद न पबंडे इज्दाद है ,
बराबर है जिसके लिए जीतहार -अमल में अमल का नहीं वो शिकार .II 22 II 
तअल्लुक से जो पाक आज़ाद है -जो इरफां में कायम है दिलशाद है ,
अमल यग की खातिर करे जो सदा -तो कर्म उसके होते हैं सरे फ़ना .ई 23 II 
को किरिया में देखे खुदा ही खुदा -है अगनी खुदा ,और हवि भी खुदा ,
हवं और हवं करने वाला वही-खुदा से जुदा वो न होगा कभी .II 24 II 


कई कर्मयोगी हैं इन से अलग -वो बस देवताओं को देते हैं यग. 
जलाकर कई आतशे किब्रिया -करें यग को इस यग के अन्दर फना .II 25 II 
कई जब्ते दिल से जलाएं मुदाम -समाअत .हिसें,दूसरी भी तमाम . 
कई हिस की आतिश में कर दें फना -सब अश्याए -महसूस मिस्ले सिदा.II 26 II 
कई जब्त से योग ऐसा कमायें -दिलो जां में इरफां की आतिश जलाएं , 
हों अफआले हिस ,या हों अफआले दम -इसी ज्ञान अगनी में कर दें भसम .II 27 II 
कई धन से और तप से करते हैं यग -कई योग और जप से करते हैं यग ,
कई लोग करते हैं यग ज्ञान से -वो अहद अपना पूरा करें जान से.II 28 II 
कई हिसे -दम में दिखाएँ कमाल-की यग उनका है रोकना दम की चाल,
वो दम अपने करते हैं कुरबान यूं -दुरूं में बरूं और बरूं में दुरूं.II 29 II 
कई रखके ज़ब्ते गिजाये बदन -करें प्रान पर प्रान अपने हवन,
उन्हें यग के इसरार मालूम हैं -वो यग के सबब पाक मासूम हैं .II 30 II 
वो अमरित के लुकमे जो यग से बचें -उन्हें खानेवाले खुदा में रचें,
हे अर्जुन ,वो महरूम छोड़े जो यग -न ये यग ही उसका ,न अगला ही यग .II 31 II 
बहुत यग के आमालो दस्तूर हैं -जो ब्रह्म ,यानी वेदों में मज़कूर हैं ,
की ये सारे कर्मों की औलाद हैं -जो ऐसा समझ ले आज़ाद है .II 32 II 
करे साजो सामां से इन्सान यग -मगर सबसे बेहतर समझ ज्ञान यग ,
सुन अर्जुन ,अगर तुझको पहचान है -की हर कर्म की इन्तहा ज्ञान है.II 33 II 
जो ज्ञानी हैं ,तू उनकी ताजीम कर-हुसूल उनसे इरफांकी तालीम कर . 
समझ इनसे सबकुछ ब इज्जो नियाज़ -तू कर इनकी सेवा ,तू सीख इनसे राज़.II 34 II 
जो अर्जुन मिले ज्ञान उलझन हो दूर -तो हो इस हकीकत का तुझ पे ज़हूर , 
कि सारा जहाँ है तेरी ज़ात में -तरी जात यानि मेरी जात में .II 35 II 
जो फ़ासिक है तू ,या गुनहगार है -गुनहगार बन्दों का सरदार है , 
तो फिर ज्ञान नैय्या पे हो जा सवार -गुनाहों के सागर से कर देगी पार .II 36 II 
सुन अर्जुन जो अम्बारे खाशाक है-लगे आग इसमे तो सब खाक है ,
यूँही ज्ञान अगनी से जाते हैं जल -बुरे हों अमल या भले हों अमल .II 37 II 
नहीं शै जहां में कोई ज्ञान सी -करे पाक फितरत जी इन्सान की,
अगर पुख्तगी योग में पायेगा -तो खुद्ज्ञान भी उसका हो जायेगा .II 38 II 
वो ज्ञानी है ,जिसको हो पुख्ता यकीं -हवास अपने रक्खे जो जेरे नगीं,
उसे ज्ञान हासिल हो अन्जमाकार -वो पाए खुदाई -सुकूनो करार .II 39 II 
वो जाहिल ,नहीं जिस का दिल पे यकीं-तजबजब से पहुंचे फ़ना के करीं ,
रहे डगमगाता न हो शादमां-ये दुनिया है उसकी न अगला जहां .II 40 II 
किया योग से जिसने तर्के अमल -कटे ज्ञान से जिसके वहमो खलल .
वही,आतमा का जिसे ज्ञान है -कहाँ उसको कर्मों से नुकसान है.II 41 II 
जहालत से पैदा हुए हैं जो शक -मिटा ज्ञान की तेग से यक बयक ,
उठ अय भारत ,और छोड़ सब वहम ए हाम-तू रख योग में दिल को कायम मुदाम .II 42II


- चौथा अध्याय समाप्त -
























Thursday, June 16, 2011

तीसरा अध्याय :कर्मयोग


कर्मयोग -अहमीयते अमल 

अर्जुन ने कहा - 
बता मुझको जब्बार गेसूदराज -अमल से अगर इल्म है सरफराज . 
तो रक्खा नहीं मुझको आजाद क्यों -मुझे कुश्तो खूँ का है इरशाद क्यों .II 1 II 
बजाहिर नहीं बात सुलझी हुई -मेरी अक्ल है इस से उलझी हुई . 
मुझे बात कतई बता दीजिये -भलाई की रह पर चला दीजिये .II 2 II 
भगवान ने फरमाया
सुन अय मेरे मासूम अर्जुन जरा -दिए रास्ते मैंने दोनों बता . 
है ज्ञान उनका रस्ता जो ग्यानी हैं लोग -जो योगी हैं ,उनका है कर्मयोग .II 3 II 
कि इंसां कभी तरके आमाल से -रिहा हो न कर्मों के जंजाल से . 
फकत तर्के आमल से है मुहाल -कि हासिल किसी को ओजे कमाल .II 4 II 
जहां में न देखोगे तुम एक पल -कि कोई भी फारिग है और बेअमल . 
सभी काम करने पे मामूर हैं -गुणों ही की ही फितरत से मजबूर हैं .II 5 II 
जो अश्या से रोके कवाये अमल -मगर दिल से खाहिश न जाये निकल . 
जो अश्या की उल्फत में सरशार हैं -परागंदा दिल हैं ,वो मक्कार हैं .II 6 II 
मगर ले कवाये -अमल से जो काम -करे मन से पहिले हवास अपने राम . 
लगावत न उसको समर का ख्याल -तो है कर्मयोगी वही बा कमाल .II 7 II 
जो है फर्ज तेरा कर उस पर अमल -कि तर्के अमल से है बेहतर अमल . 
अमल छोड़ देने हों तुझको तमाम -तो मुश्किल है तेरे बदन का कयाम .II 8 II 
अमल जिस कदर भी है यग के सिवा -वो दुनियां को बंधन में रक्खें सदा . 
किये जा तू सब काम यग जानकर -लगावत न रख ,और न फल पे नजर .II 9 II 
जो खालिक ने इंसां को पैदा किया -तो यग को भी पैदा किया और कहा .
कि फूलो फलो ,रख के यग पे यकीन -मुरादों कि ये गाय है कामधीन.Ii 10 II
नवाजा करो यग से तुम देवता -तुम्हें देवता भी नवाजें सदा .
जो इक दूसरे को करे साजमंद -तो हासिल हो तुमको मुकामे बुलंद .II11 II
यागों से नवाजे हुए देवता -तुम्हें नेमतें सब करेंगे अता .
मगर लेके नेमत जो देता नहीं -समझ लो कि वो चोर है बिल्यकीं.II 12 II 
निकूकार खाएं जो यग का बचा -गुनाहों से करते हैं खुद को रिहा . 
जो थाली खुद अपनी ही खातिर पकाएं -तो अपने ही पापों का भोजन वो खाएं .II 13 II 
है जिन्दों का गल्ले पे दारोमदार -तो गल्ले का बारिश पे है इन्हिसार . 
हो बारिश ,जो यग का करें एहतमाम -मगर यग्ग हों कर्मों से पैदा तमाम .II14 II 
सभी कर्म हों ब्रह्म से रूनुमा -करे ब्रह्म को रूनुमा लाफना . 
सो वो ब्रह्म दुनिया पे छाया हुआ -है यग के अमल में समाया हुआ .II15 II
इसी तरह दुनिया का चलता है दौर -जो इस दौर से हट के के राह और . 
वो खाहिश का बन्दा गुनाहगार है -हयात उसकी दुनिया में बेकार है .II 16 II 
मगर आत्मा से है जिसको लगन -फकत आत्मा में रहे जो मगन . 
सदा आत्मा ही से खुरसंद है -कहाँ फिर वो कर्मो का पाबंद है .II 17 II 
न कुछ उसको अफआल से फायदा -न कुछ तर्के आमाल से फायदा . 
न दिल बस्तगी है जहाँ से उसे -न कुछ मुद्दआ ईं ओ आं से उसे .II 18 II 
रहो इसलिए तुम लगावट से दूर -बजा लाओ फर्ज अपने सब बिल्जरूर . 
इसी से मिलेगा मुकामे बुलंद -लगावट न रक्खो अमल में पसंद.Ii 19 II 
अमल से बुजुर्गों ने पाया कमाल -जनक जैसे इन्सां हुए बा मिसाल . 
इसी तरह नेकी किये जाओ तुम -जहां को भलाई दिए जाओ तुम .II 20 II 
कोई नामवर शख्श करता है काम -तो करते हैं तकलीद उसकी अवाम . 
बड़ा आदमी जो बनाये उसूल -वही सारी दुनिया करेगी कबूल.II 21 II 
मुझे देख ,दुनिया को देना है कुछ -न तीनों जहानों से लेना है कुछ . 
कमी कुछ नहीं ,गो मुझे रीनाहार -मगर फिर भी रहता हूँ मसरुफे कार .II 22 II 
करूं जो न अनथक लगातार काम -तो रुक जाएँ दुनिया के धंदे तमाम . 
चलें लोग मेरी रविश पर सभी -करें काम वो भी न अर्जुन कभी .II 23 II 
जो तर्के अमल मैं करूँ इख्तियार -उजड़ जाए दुनिया ए नापायदार . 
तो वर्णों का मेरे सबब घालमेल -बिगड़ जाये लोगों की हस्ती का खेल .II 24 II 
हो दाना की जैसे अमल में लगन -उन्हें काम ही की लगन है ,लगन .
हों वैसे ही नादां के निष्काम काम -रहे ताकि लोगों में कायम निजाम .II 25 II 
अगर मूरखों में अमल की हो जोश -मजबजब न उनको करें अहले होश.
करें योग में रह के खुद कारोबार -यही उनको रखे मसरूफे कार .II 26 II 
ये दुनिया की रौनक ,कामों की धुन -सबब इनका असली है फितरत के गुन.
मगर जिनके दिल में अहंकार है -समझता है खुद को की मुख़्तार है. II 27 II 
जबरदस्त अर्जुन !हो जिस पर अयाँ-गुनों और कर्मों का राजे निहां .
रहे बे तआल्लुक ,कि दुनिया के काम -गुनों पर गुनों के अमल का है नाम .II 28 II 
वो मूरख जो माया के धोखे में आये -गुनों और अफआल से दिल लगाये .
वो जाहिल है ,और अक्ल में खामकार-न दुविधा में डालें उन्हें होशियार .II 29 II 
तू मन अपना परआत्मा में लगा -खुदी औ हवस छोड़ मत जी जला .
मुझे सौंप दे काम सब बेदिरंग -उठ अर्जुन !उठ अर्जुन !हो मसरुफे जंग .II 30 II 
जो हैं मेरी तालीम पर कारबन्द-करें नुक्ताचीनी को नापसंद . 
अकीदत से पाबन्दे इरशाद हैं -वो कर्मों के बंधन से आजाद हैं .II 31 II 
जो आमिल नहीं मेरी तलकीन पर -जो तकरार ओ हुज्जत करें बेश्तर. 
उलूम उनके हैं सब फरेबो फितूर -वो जाहिल तबाही में जाएँ जरुर .II32 II
कोई इल्म से लाख पुरनूर है -मगर अपनी फितरत से मजबूर है . 
बशर अपनी फितरत बदलता नहीं -यहाँ जब्र से काम चलता नहीं .II33 II
कभी दिल को रगबत हो महसूस से -कभी दिल को नफ़रत हो महसूस से . 
ये रहजन हैं दौनों ,न मरगूब हो -तू गलबे से इनके न मरगूब हो .II 34 II 
न ले गैर का धर्म ,गो खूब है -किधर्म अपना नाकिस भी मरगूब है . 
जो मरना पड़े ,धर्म अपने पे मर -तुझे गैर के धर्म में है खतर.II 35 II 
अर्जुन का सवाल - 
फिर अर्जुन ने पूछा
 कि वो कुव्वत है क्या -करे जिस से इन्सां गुनाहों खता . 
खता कोई करता नहीं चाह से -वो सब कुछ करे जबरो इकराह से.II 36 II 
भगवान का इरशाद -
सुना ये तो भगवान बोले कि बस -गजबनाक दुश्मन है तेरी हवस .
समझ ये राजोगुन की औलाद है -ये लोभी है ,पापी है ,जल्लाद है.II 37 II 
धुंआ रूए आतिश को जैसे छुपाये -रूए शीशा पर जिस तरह जंग आये .
छुपे पेट में माँ के जैसे जनीं -हवस छुपे से ज्ञान तेरा यहीं .II 38 II 
है सब ज्ञान वालों की दुश्मन हवस -ये पीछा न छोड़ेगी दुश्मन हवस .
हवस आग ऐसी है ,कुंती के लाल -कि इस आग का सैर करना मुहाल.II 39 II 
हवासो - दिलो -अक्ल ए नेकनाम -हवस के लिए हैं ये तीनों मुकाम .
यहीं ज्ञान इन्सां का रूपोश हो -यहीं तन का वासी भी मदहोश हो .II 40 II 
इसी वास्ते ,अर्जुन अय हक़ शनास-तू कर अपने काबू में अपने हवास.
हवास को फ़ना कर ,कि है ये गुनाह -करेगी यही इल्मो इरफां तबाह .II 41 II 
हवास आदमी के हैं आला तमाम -मगर उनसे ऊंचा है मन का मुकाम .
है मन से बड़ा मरतबा अक्ल का -मगर अक्ल से बढ़ के है आतमा.II 42 II 
समझ आत्मा अक्ल से है बुलंद -बना नफस को रूह का पायबंद .
हवास है तेरी दुश्मने खौफनाक -जबरदस्त अर्जुन इसे कर हलाक.II 43 II 
      तीसरा अध्याय समाप्त -











Tuesday, June 14, 2011

दूसरा अध्याय :सांख्ययोग


सांख्य योग -शगले इरफान 
संजय ने कहा - 
जो अर्जुन का देखा ये रंजोमलाल -गमो सोज दिल में तबीयत मलाल , 
नजर दुःख से बेचैन ,आँखों में नम-तो भगवान बोले जि राहे करम .II 1 II 
भगवान ने कहा - 
सुन अर्जुन ये कैसी रविश है रजील -जो दोजख में डाले ,जो कर दे जलील . 
कठिन वक्त में ऐसी क्यों बेदिली -न हो आर्यायों में यूं बेदिली .II 2 II 
तू अर्जुन न बन हीजे नामर्द ओ जार -,नहीं तेरे शायाने शां जी को हार . 
ये कम हिम्मती छोड़ ,कर जी कड़ा-,उदूसोज अर्जुन ,खडा हो !खडा .II 3 II 
अर्जुन का जवाब - 
वो बोला कि,अय फातिहे दुश्मना-मधूमार मुझसे ये होगा कहाँ . 
मुआज्जिज हैं ,भीषम द्रोण हैं गुरू -बहाऊँ मैं तीरों से उनका लहू .II 4 II 
गुरू मोहतरम का नहीं खूँ रवा -गदाई में इस से तो जीना भला . 
मैं इन खैरख्वाहों का खूं गर करूं -तो इशरत के लुक्मे लहू से भरूँ.II 5 II 
मैं क्या जानूँ अच्छा है ,अय सरपरस्त -शिकस्त इनको देना या खाना शिकस्त . 
ये धृष्ट राष्ट्र के पिसर हैं तमाम -इन्हें मार कर अपना जीना हराम .II 6 II 
तबीयत है कमजोर ,दिल नर्म है-ये उलझन है क्या मेरा धर्म है . 
मैं चेला हूँ ,मेरी मदद कीजिए -जो हो नेक रस्ता बता दीजिए .II 7 II 
जहाँ का मुझे मिले खलल मुझको राज -मुझे देवता भी जो दें आकर खिराज . 
मैं उस हाल में भी रहूँगा उदास -इसी दर्द से ग़ुम हैं मेरे हवास .II 8 II 
संजय ने कहा - 
गुडाकेश ,वो फातिहे -दुश्मनां-ऋषीकेश से कर चुका जब बयां . 
तो यूं कह के चुप हो गया वो हजीं-"मैं गोविन्द ,लड़ता लड़ाता नहीं .II 9 II 
इधर फ़ौज थी और उधर फ़ौज थी -दिल अर्जुन का और गम की इक मौज थी. 
ऋषिकेश कुछ मुस्कुराने लगे -ये इरफ़ान के मोती लुटाने लगे .II 10 II 
भगवान ने कहा -
तू बातों के आकिल न हो दिल मलूल -न कर उनका गम ,जिनका गम है फिजूल . 
सताएं न दाना को रंजो अलम-मरे का न सोग और जीने का गम .II 11 II 
अजल से थी मौजूद हस्ती मेरी -अजल से थी मौजूद हस्ती तेरी . 
ये राजा सभी ,और ये खिलकत तमाम -हमेशा से हैं ,और रहेंगे मुदाम .II 12 II 
करे रूह जैसे तगय्युर बगैर -लडकपन जवानी बुढापे की सैर . 
यही फिर नए तन में होगी मकीं -अगर दिल है मजबूत चिंता नहीं .II 13 II 
ये गर्मी ,ये सर्दी ये दुःख सुख तमाम -बस अहसासे अश्या से हों लाकलाम . 
ये कैफीयतें आनी -जानी हैं ये -सहे जा खुशी से ,कि फानी हैं ये .II 14 II 
वो इन्सां ,असर जिस पे इनका नहीं -ख़ुशी से ,न खुश हो न गम से हजीं. 
सुन अर्जुन ,है कायम दिल उसका मुदाम -उसी की है शायां हयाते दवाम .II 15 II 
जो बातिल है मौजूद होता नहीं -जो हक़ है ,वो नाबूद होता नहीं .
वोहै बूद ओ नाबूद से से बा खबर -हकीकत पे रहती है जिसकी नजर .II 16 II 
उसी को बका है ,उसी को सबात -जहाँ पर है छायी हुई जिसकी जात .
भला किसकी ताकत है ,किसकी मजाल -फ़ना कर सके हस्तीये लाजवाल .II 17 II 
बसाये हैं जिस आत्मा ने वुजूद -वो कायम है ,दायम है और बे हुदूद .
है फानी बदन ,आत्मा ला जवाल-फिर अर्जुन है क्यों जंग में कीलो -काल .II 18 II 
कभी खून करती नहीं आत्मा -कभी खुद भी मरती नहीं आत्मा .
न कातिल है ये ,और न मकतूल है -जो ऐसा समझता है ,मजहूल है .II 19 II 
जनम इसको लेना ,न मरना इसे -न आकर जहां से गुजरना इसे .
अनादी ,फ़ना और तगय्युर से पाक -ये मरती नहीं ,गो बदन हो हलाक.II 20 II 
जो समझे इसे दायमो लायजाल-मुबर्रा विलादत से और बे जवाल .
किसी का वो क्योंकर बहायेगा खून -किसी का वो क्योंकर कराएगा खून .II 21 II 
बदलता है इन्सां लिबासे कुहन -नया जमा करता है फिर जेबे तन .
उसी तरह कालिब बदलती है रूह -नए भेस में फिर निकलती है रूह .II 22 II 
कटेगी न तलवार से आत्मा -जलेगी कहाँ नर से आत्मा .
न गीली हो पानी लगाने से ये -न सूखे हवा में सुखाने से ये .II 23 II 
न कट ही सके ,और न जल ही सके -न सूखे न पानी से गल ही सके .
कदीम और अटल भी है दायम भी है -मुहीते जहां भी है ,कायम भी है .II 24 II 
नहीं आत्मा को तगय्युर जवाल -हवास इसको पायें ,न पहुंचे ख़याल .
तुझे आत्मा का जो ये ज्ञान है ,तो फिर किसलिए गम से हलकान है .II 25 II 
अगर तू समझता है ,ये आत्मा -हो पैदा कभी और कभी हो फना .
तो फिर भी है लाजिम तुझे अय कवी -कि गम आत्मा का न करना कभी .II 26 II 
जो पैदा हो मौत उसको आये जरुर -मरे ,तो जनम फिर वो पाए जरुर .
जो ये अम्र लाजिम है ,और नागुजीर -तो फिर किसलिए तू है गम का असीर .II 27 II 
निगाहों से पहिले निहां हों वुजूद -ये फिर बीच में अयां हों वुजूद .
निहां फिर ये हो जाएँ अंजामकार -तू अर्जुन है फिर किसलिए बेकरार .II 28 II 
कोई आत्मा से तआज्जुब में आये -कोई बात हैरत से उसकी सुनाये .
कोई जिक्र सुन सुन के हैरान है -मगर सुन सुनाकर भी अनजान है .II 29 II 
जो है सब के तन में मकीं आत्मा -ये दायम है ,फानी नहीं आत्मा .
जो इसपर यकीं है तो ,भारत के लाल -न कर अहले हस्ती का रंजो मलाल .II 30 II 
तेरा फर्ज क्या है ,रख इस पे नजर-न जी डगमगा इसकी तकमील कर . 
अमल क्षत्री का कोई क्यों न हो -न पहुंचे कभी धर्म की जंग को .II 31 II 
हैं अर्जुन वही क्षत्री खुशनसीब -मिले मार्का जिनको ऐसा अजीब . 
ये बिन मांगे नेमत खुद आई है घर -खुले खुद बखुद आके जन्नत के दर .II 32 II 
अगर धर्म की तू लडेगा न जंग -और इस जंग में कुछ करेगा दिरंग . 
तो पत तेरी बाकी रहेगी न धर्म -तुझे पाप घेरेंगे आयेगी शर्म .II 33 II 
तुझे लोग देखेंगे तहकीरसे -न लेंगे तेरा नाम तौकीर से .
जो बा आबरू इस जहां में रहे -वो मरने को जिल्लत पै तरजीह दे .II 34 II 
कहेंगे महारथ ,बहादुर सवार -तू मैदां से डर कर हुआ है फरार .
तुझे सब बुलाते हैं इज्जत से अब -ये लेंगे तेरा नाम जिल्लत से तब .II 35 II 
इधर तेरे दुश्मन जो रखते हैं कद -जिन्हें है शुजाअत पै तेरी हसद .
वो बोलेंगे नागुफ्तनी बोलियाँ -मिले रंजो गम इस से बढकर कहाँ .II 36 II 
मरेगा तो पायेगा जन्नत में घर -अगर जित जाये ,तो दुनिया हो सर .
उठ अर्जुन ,खड़ा हो दिखा जोरे जंग -कि मर्दों को मैदां से हटना है नंग .II 37 II 
हो सुख हो याकि दुःख सबको यकसां समझ -मसावी यहाँ नफ़ओ नुक्स्सां समझ . 
बराबर समझ जंग में जीत हार-बचेगा गुनाहों से ,दो हाथ मार.II 38 II 
ये तालीम थी सांख्य के ज्ञान से-समझ योग की बात अब ध्यान से . 
अगर योग में तुझको है इन्म्हाक -तो कर्मों के बंधन से हो जाये पाक .II 39 II 
ये कोशिश हो इसमे कोई रायगां-हो रस्ते में इसके रुकावट कहाँ . 
ज़रा भी जो ये धर्म आ जायेगा -तो खौफो खतर से बचा जाएगा .II 40 II 
जो अक्ले इरादी रहे मुस्तकिल -तो यकसूँ हो और पुख्ता इन्सां का दिल . 
इरादा हो जिसका न सुलझा हुआ -रहेगा ख्यालों में उलझा हुआ .II41II
जो वेदों के लफ्जों में हैं शादमां-वो नादां करें गुल अफ्शानियाँ . 
उन्हें कर्म कांडों से है आगही -वो कहते हैं ,सब कुछ यही है ,यही .II42II
जनम को बताएं वो कर्मों का फल -सिखाएं जारो ऐश के सौ अमल . 
वो खुदकाम है ,कामनाओं में मस्त -वो जन्नत के तालिब जन्नत परस्त .II 43 II 
फंसें जिनके दिल ऐसे अक्वाल में -घिरें ऐश दौलत के जंजाल में . 
समाधी नहीं ,दिल पै काबू नहीं -कि अक्ले इरादी ही यकसू नहीं .II 44 II 
हैं वेदों में लिक्खे हुए तीन गुन-तू बाला हो इनसे न रख इनकी धुन . 
रख इजदाद का ,और न हासिल का गम -हो महव आत्मा में ,सदाकत पै जम .II 45 II 
वो इन्सां जिसे ब्रह्म का ज्ञान है-उसे कर्म कांडों पे कब ध्यान है . 
उसे वेद महज एक तालाब है-जहाँ सारे आलम में सैलाब है .II 46 II 
तुझे काम करना है ,ओ मरदे कार -नहीं इसके फल पे तुझे इख्तियार . 
किये जा अमल ,न ढूंढ़ इसका फल -अमल कर ,अमल कर , न हो बे अमल .II 47 II 
रख अर्जुन तू दिल में योग इस्तवार-तू कर बे लगावट अमल इख्तियार . 
न जीते की शादी ,न हारे का सोग -कि दिल के तवाजन का है नाम योग .II 48 II 
सुन अब अक्ल के योग का हल सुन -बहुत पस्त हैं जिनके कर्मों के गुन.
बना अक्ले खालिस को तू दस्तगीर -रहें फल के तालिब जलीलो हकीर .II59 II 
लगी है जिसे अक्ले खालिस कि धुन -यहीं छोड़ देगा वो सब पाप पुन .
कमा योग ,तन मन में बस जाये योग-अमल में हुनर हो तो कहलाये योग .II 50 II 
कि शरशारे दानिश मुनी बा अमल -करें सब अमल ,छोड़ कर इनके फल .
जनम के वो बंधन से आजाद है -सुरुरे अबद,पाक ,दिलशाद हैं .II 51 II 
जो हो अक्ल आजाद जंजाल से -निकल जाये तू मोह के जाल से.
सुनी बात से भी करे एहतराज -रहे अनसुनी से भी तू बेनियाज .II 52 II 
परेशां ख्याली से पाए सुकूं-मुक़द्दस सहीफों का गम हो फुसूँ .
समाधी से कायम हो दिल ,जात में -तो हासिल हो फिर योग हर बात में .II53 II 
अर्जुन का सवाल -
फिर अर्जुन ने पूछा ,ये भगवान से-समाधी में दी को जो कायम करे .
है उस कायमुल अक्ल का क्या चलन -हो क्या बूदो -बाश,उसका कैसा सुखन .II 54 II
भगवान से कहा - 
तो भगवान बोले ,जो हो महवे जात-जो मन से करे दूर सब खाहिशात . 
रहे जिसका दिल रूह से मुतमइन -उसी फर्द को कायमुल अक्ल गिन .II 55 II 
जो सुख से सुखी हो ,न दुःख से दुखी -न खौफ उसको आये न गुस्सा कभी . 
न जज्बों के जंजाल में आजाये वो -मुनी कयामुल अक्ल कहलाये वो .II 56 II 
बुराई जो पहुंचे ,तो नालां न हो -भलाई जो पहुंचे तो शादाँ न हो . 
न इस से तआल्लुक न उस से लगाव -यही कयामुल अक्ल है सुभाव .II57 II
जरा भी दे कोई कछुवे को छेड़ -तो लेता है फ़ौरन सब एजा सुकेड़. 
सुकेड़े जो हर शै से अपने हवास -वो है कायमुल अक्ल अय शनास .II 58 II 
करें नेमतें तर्क ,परहेजगार -मगर शौके लज्जत से हो बेक़रार . 
उसे तर्के लज्जत की लज्जत मिले -उसे दीद -बाजी की दौलत मिले .II 59 II
खिरदमंद को भी हवासो ख्याल -जो तेजी से आजायें ,कुंती के लाल . 
तो मन को भी वो छीन ले जायेंगे -करे लाख कोशिश ,न हाथ आयेंगे .II 60 II
हवास अपने रोक ,और लगा मुझ में दिल -तू शरशार हो ,योग में मुस्तकिल . 
रहें जब्त जिसके होशो हवास -वो है कायमुल अक्ल ए हक़ शनास.II 61 II 
लगाये जो महसूस अश्या से मन -तआल्लुक बढे उनसे और हो लगन . 
तआ ल्लुक से खाहिश का हो फिर जहूर -हो खाहिश से गुस्से का दिल में फितूर .II 62 II 
हो गुस्से से फिर तीरगी रूनुमा -असर तीरगी का सुहू औ खता . 
इसी सुहू से अक्ल हो पायमाल -हो ,जाया हुई अक्ल ,आये जवाल II 63 II 
जो महसूस करता है दुनिया को सैर -न उल्फत किसी से है जिसको न बैर .
रहे नफ्स पर जब्त जिसको मुदाम -वो तसकीने दिल रहे शादकाम .II 64 II 
दिले पुरसुकूं में कहाँ उसको रंज -कि दुख दूर हो जाएँ मिट जाये रंज .
जो पैदा हो दिल में सुकूनो करार -वहीँ अक्ल कायम हो और इस्तवार.II 65 II 
न हो दिल पे काबू तो ,दानिश मुहाल-न हो दी पे काबू तो भटके ख्याल .
परेशां खयाली से से आये न सुख -जिसे सुख न आये सदा उसको दुख .II 66 II


हवास आदमी के भटकते हों गर-तो हों उस हर्जगर्दी का दिल पे असर .
तो दिल -अक्ल को ले चले इस तरह -कि तूफां में किश्ती बहे जिस तरह .II 67 II
जो इन्सान हवास अपने रोके रहे -न महसूस अश्या में भटका रहे .
तो सुन ले मेरी बात ,अर्जुन कवी -कि है कायमुल इन्सां वही.II 68 II
जिसे रात कहती है दुनिया तमाम -निगाहों में आरिफ की दी है मुदाम .
जो दिन अहले आलम के नजदीक है -वो आरिफ की शब् है ,कि तारीक है .II69 II
समंदर में गायब हों दरिया हजार -रहेगा वो लबरेज और बा वकार. 
सब अरमां हों गुम जिनके सिने में बस -वही पायें राहत,न अहले हवस .II 70 II 
जो इन्सां करे खाहिशें दिल से दूर -हवस का न हो जिसके दिल में फितूर . 
न उसमे खुदी हो न तेर - मेर -सुकून उसको हासिल है ,दिल उसका सैर .II 71 II 
यही है विसाले मुकामे खुदा -जहाँ एके हों सब तवह्हम फ़ना . 
दिले वापसी भी जो ये ज्ञान हो -तो हासिल उसे ब्रह्म निर्वान हो .II 72 II 
    -दूसरा अध्याय समाप्त -

































































Tuesday, June 07, 2011

पहिला अध्याय


अर्जुन विषाद योग :   अर्जुन की बेदिली                                                                      
धृतराष्ट्र ने कहा - 
कुरुक्षेत्र की धर्म भूमि में जब -मिले पांडवों से मेरे लाल सब . 
लड़ायी का दिल में जमाये ख़याल -तू संजय बता उनका सब हालचाल II 1 II 
संजय ने कहा - 
महाराज आई नजर जिस घड़ी -सफ आरास्ता पांडवों की खडी , 
गये राजा दुर्योधन उठ कर शिताब -किया जाके अपने गुरु से ख़िताब II 2 II 
दुर्योधन और गुरु की बातचीत 
गुरूजी ! जरा देखिये औज मौज -सफ आरा है पाण्डु बेटों की फ़ौज . 
द्रुपद का पिसर उनका सरदार है -जो चेला तुम्हारा ही तर्रार है II 3 II 
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सफा .1 -सफ आरास्ता =पंक्तिबद्ध ,शिताब =शीघ्र ,तर्रार =चतुर
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लड़ाई को निकले हैं ,अहले खदंग -जो सब ,अर्जुन और भीम हैं वक्ते जंग . 
विराट और युयुधान मर्दाने कार-द्रुपद सा महारथ बहादुर सवार II 4 II 
कहीं धृष्टकेतु कहीं चेकितान -कहीं राजा काशी का शेरे जमान 
इधर कुन्तिभोज और पुरोजित उधर -कहीं शैव्या सूरते गादे-नर II 5 II 
युधामन्यु जैसा कहीं शूरवीर -कहीं उत्तमौजा बली बेनजीर . 
कहीं है ,बहादुर सुभद्रा का शेर -पिसर द्रौपदी का महारथ दिलेर II 6 II 
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सफा .2 -अहले खदंग =धनुष धारी ,शेरे जमां=विश्व विजयी ,सूरते गादे नर =महाबली
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मुक़द्दस गुरु साहबे एहतराम -दौनों जहानों में आली मुकाम .
सुनो ,अब हमारे हैं सरदार कौन -हमारी सिपह के हैं सालार कौन II 7 II 
गुरूजी इधर सबसे अव्वल ,जनाब -उधर फिर भीष्म और कर्ण लाजवाब 
कृपा फतहमंद ,अश्वथामा सा नर -विकर्ण और बली सोमदत्त का पिसर II 8 II 
दिलावर इसी शान के बेशुमार -जो मेरे लिए जां करदें निसार .
सरापा मुसल्लह ,उठाये खदंग -अयाँ जिन पे सब जंग के रंग ढंग II 9 II 
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सफा .3 -मुकदस =पवित्र ,एहतराम =आदर ,सालार =सेनापति ,मुसल्लह =सशस्त्र .खदंग =धनुष
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-हमारी इधर फ़ौज है बेशुमार -कमां दार भीषम सा आली वकार . 
मुकाबिल में महदूद फौजे गनीम -है सेनापति जिनके लश्कर का भीम II 10 II 
जवानो कतारों में बँट जाइयो -सफें बांध कर रन में डट जाइयो . 
दिलेरो !सफें अपनी भर दो सभी -न भीषम पे आंच आये मर्दों कभी II 11 II 
ये सुन कर गरजने लगा मिस्ले शेर -वो भीषम पिता ,वो पिरे दिलेर . 
वो शंख अपना जंगी बजाने लगा -तेरे लाल का दिल बढ़ाने लगा II 12 II 
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सफा .4 -महदूद =अपर्याप्त ,गनीम =शत्रु सेना ,पीरे दिलेर =वृद्ध शेर (भीष्म )
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जंग की शोरिश 
यकायक उठा फ़ौज से शोरगुल -नाकूस चिल्लाए खडके दुबुल . 
गरजने ,धड़कने लगे ढोल दफ -लगीं गौमुखें चीखने हर तरफ II 13 II 
खड़ा था वहां एक रथ शानदार -जुते जिसमे बुर्राक सब राहवार. 
थे माधव भी अर्जुन भी उसमे खड़े -वो शंख आसमानी बजने लगे II 14 II 
ऋषिकेश का पांच जन्या पे जोर -इधर देवदत्ता पे अर्जुनका शोर . 
उधर भीम सा मर्द खूंखार था -जो पोंडर पे चिंघाड़ता था खड़ा II 15 II 
------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------
सफा .5 -नाकूस =शंख ,दुबुल =ढोल ,गौमुखें =नरसिंघा ,बुर्राक =सफ़ेद घोड़े ,पौण्ड्र=शंख का नाम
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महीपत युधिष्ठिर वो कुंती के लाल -विजय पर दिखता था अपना कमाल. 
दिखाते नकुल और सहदेव जोश -लिए इक मनीपुष्प और एक सुघोष II 16 II 
वो काशी का राजा धनुषधार भी -शिखंडी महारथ ज़र्रार भी . 
विराट और बली धृष्ट द्यूमन सभी -कवी सात्यकी जो न हारें कभी II 17 II 
द्रुपद और सुभद्रा का बलवंत लाल -पिसर द्रौपदी के सभी बाकमाल . 
महाराज हरसू दिखाते थे जोश -बजाते थे शंख अपने बा सद खरोश II 18 II 
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सफा .6 -हरसू =हर जगह ,सद खरोश =सौगुना जोश
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वो हंगामा बरपा हुआ अल अमां -हुए शोर से पुर जमीं आसमां. 
हिरासां थे धृत राष्टर के पिसर -लगे फटने सीनों में कल्बो जिगर II 19 II 
कि इतने में पांडू का बेटा उठा -उड़ाता फरेरा हनूमान का . 
कमान उसने लेली ,कि तेरे पिसर -खड़े थे चलाने को तीरों तबर II 20 II 
महीपत वो बोला ऋषिकेश से -कि अय लाफना रथ बढ़ा लीजिये . 
चलें देखने वस्त में औज मौज -इधर अपनी फ़ौज ,उधर उनकी फ़ौज II 21 II 
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सफा .7 -अल अमां =भयानक ,कल्बो जिगर =दिल कलेजा ,तीरों तबर = तीर कमान ,वस्त =बीच में ,लाफाना =अच्युत
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मैं देखूं जरा ,वो जवां कौन है -जरीं कौन है ,पहलवां कौन है . 
लड़ाई को आये हैं ,जो बे दिरंग -मुझे आज दर पेश है जिनसे जंग II 22 II 
नजर उनकी सूरत पे कर लूँ जरा -जो आये हैं मरदे जंग आजमा . 
ये मकसद है जिनका कि हो उनसे शाद -वो धृत राष्टर का पिसर कज निहाद II 23 II 
तब संजय ने कहा - 
गुडाकेश से जब ऋषिकेश ने -सुना ये तो रथ बढ़ाने लगे . 
था उस रथ का रुतबा रथों में बड़ा -किया दौनों फौजों में लाकर खड़ा II 24 II 
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सफा .8 -बे दिरंग =निडर ,जंग आजमा =योद्धा ,कज निहाद =दुर्बुद्धि
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तो द्रोण और भीषम डटे थे वहां -जमे थे वहीँ राजगाने जहां . 
कहा देख अर्जुन !खड़े सफ ब सफ -लड़ाई की खातिर किये सर ब कफ़ .II 25 II 
अर्जुन की बेदिली 
तब अर्जुन ने देखा ,खड़े हैं तमाम -चचे,दादे ,उस्ताद जी एहतराम . 
कहीं बेटे ,पोते ,कहीं यार हैं -बिरादर हैं ,मामू हैं ,गमखार हैं .II 26 II 
खुसर है कोई ,कोई दिलबंद है -की इक से लगा एक का पैबंद है . 
जिगर से जिगर की लड़ाई है आज -की लड़ने को भाई से भाई है आज .II 27 II 
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सफा. 9 -सर ब कफ़ =हथेली पर सर ,दिलबंद =सुहृद ,खुसर =ससुर
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अर्जुन ने कहा -
हुआ दिल को अर्जुन के रंजो मलाल -कहा रहमो रिक्कत से होकर निढाल . 
महाराज !ये क्या है दर पेश आज -कि लड़ने को है खैश से खैश आज .II 28 II 
बदन में नहीं मेरे तबो तवां-दहन खुश्क है सूखती है जुबां. 
मेरे रोंगटे भी खड़े हैं सभी -लगी है मुझे कपकपी थरथरी .II 29 II 
चली मेरी हाथों से गांडीव अब -बदन जल रहा है मेरा सब का सब . 
ये लो पाँव भी लड़खड़ाने लगे -मेरे सर को चक्कर से आने लगे .II 30 II 
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सफा.10 -खैश=स्वजन ,ताबो तवां =शक्ति ,दहन खुश्क =गला सूखना
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महाराज केशव मैं अब क्या कहूँ -कि आसार बद हैं ,बुरे हैं शगूँ. 
ये कारे जबूं कर के क्या फायदा -अजीजों का खूँ कर के कुआ फायदा .II 31 II 
मुझे खाहिशे फतहो नुसरत नहीं -मुझे शौके ऐशो हुकूमत नहीं . 
मुझे बन्दे ताजे शही हेच है -ख़ुशी हेच है ,जिंदगी हेच है .II 32 II 
तमन्ना थी जिनके लिए राज की -ख़ुशी जिन से थी इशरतो ताज की. 
खड़े हैं वो तीरों कमां जोड़ कर -ज़रो माल जां सबसे मुंह मोड़ कर .II 33 II 
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सफा.11 -कारे ज़बूँ =दुष्कार्य ,फतहो नुसरत =विजय ,हेच =तुच्छ .ताजे शही =राज मुकुट ,इशरत =सम्पदा
--------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------
पिदर हैं सभी ,दादे उस्ताद भी -पिसर भी हैं ,और उनकी औलाद भी . 
ये मामूँ,वो बीवी का भाई ,वो बाप -सभी में कराबत ,सभी में मिलाप .II 34 II 
मुझे क़त्ल कर दें अगर बेदरेग -न फिर भी उठाऊंगा अपनों पे तेग . 
मधूमार !क्या शै है दुनिया का राज -न लूँ इसतरह तीनों आलम का ताज .II 35 II 
फ़ना हों जो धृष्ट राष्ट्र के पिसर -तो होगा ख़ुशी में दिल का गुजर . 
ये ज़ालिम अगर हो भी जाएँ तबाह -न छोड़ेगा पीछा हमारा गुनाह .II 36 II 
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सफा .12 -कराबत=निकट सम्बन्ध ,मधूमार =मधुसुदन
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ये धृष्ट राष्ट्र के जो फरजंद हैं -हे माधव ,सब अपने जिगरबंद हैं . 
अगर हम अजीजों को कर दें हलाक़-रहेंगे सदा गम से अंदोहनाक .II 37 II 
समझ इनकी हरचंद गहना गयी -दिलों पे हवा ओ हवस छा गयी . 
न समझें वो यारों से लड़ना खता -न अहसास हों गर काबिले फना .II 38 II 
नहीं ,लेकिन ऐसे तो नादाँ हम -बचें पाप से क्यों न भगवान हम . 
कि ज़ाहिर है गर खानदां हो तबाह -कहाँ इस से बढ़कर है कोई गुनाह .II 39 II 
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सफा.13 -अंदोहनाक =व्यथित ,खता =अपराध ,फ़ना =नाश
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कबीला फ़ना गर कोई हो गया -कदीमी वो धर्म सब खो गया . 
रहा धर्म पर जब न दारोमदार -अधर्म उस पे ग़ालिब हो अंजामकार .II 40 II 
अधर्मी जो हो जाएँ सब मर्दोजन -बिगड़ जाये फिर औरतों का चलन . 
रहें औरतें ही न जब पाकबाज़ -तो वर्णों में बाकी कहाँ इम्तियाज़ .II 41 II 
जो दौनों ही खराबी मचाएं -वो और उनके कुनबे जहन्नुम में जाएँ . 
बड़ों को न पिंड और पानी मिले -तनज्जुल उन्हें जावदानी मिले .II 42 II 
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सफा.14 -पाकबाज= चरित्रवान ,इम्तियाज =भेद ,तनज्जुल =पतन ,जावदानी =सदा के लिए
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कबीलों को गारत करे जो बशर -हों वर्ण उनके पापों से जेरोजबर . 
वो जातों की रीतें मिटाते रहें -घरानों के दस्तूर जाते रहें .II 43 II 
किसी खानदांजो हो धर्म नास-न रीतों की परवाह न रस्मों का पास . 
तो भगवान हमने सुना है मुदाम -जहन्नुम के अन्दर है उनका मुकाम .II 44 II 
सद अफसोस हम खोके अकेले सलीम -करने लगे हैं गुनाहे अजीम . 
बहायेंगे अफसोस अपनों का खून -कि है बादशाही का सर में जूनून .II 45 II 
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सफा.15 -जेरोजबर =विनष्ट ,अकेले सलीम =सुमति ,गुनाहे अजीम =महापाप
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ये बेहतर है ,धृत राष्टर के पिसर -उड़ा दें जो तलवार से मेरा सर . 
न हथियार लेकर लडूँ उनके साथ -बचाने को अपने उठाऊँ न हाथ .II 47 II 
संजय ने कहा - 
ये कहते हुए हाले दिल नागहां-दिए फेंक अर्जुन ने तीरों कमां.
न रथ में खड़ा रह सका वो हजीं -जो दिल उसका बैठा तो बैठा वहीँ .II 47 II 
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सफा .16 -हजीं=व्यथित
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पहिला अध्याय समाप्त