Thursday, June 30, 2011

आठवां अध्याय :अक्षरब्रह्म


 अक्षरब्रह्म -हस्तीये लाज़वाल -


अर्जुन का सवाल -
फिर अर्जुन ने पूछा ये बागवान से-कि पुरुषोत्तम ,अब मुझसे फरमाइए , 
है ब्रह्म और अध्यात्म क्या मुद्दआ -हैं कर्म और अधिभूत ,अधिदेव क्या.II 1 II 
अधियग है क्या चीज बतलाइये -मकीं तन में है कौन फरमाइए , 
जिसे दिल पे काबू है मरते हुए -मधूकुश तुम्हे कैसे पहचान ले .II 2 II 
भगवान का जवाब - 
है बाह्म हस्ती आली ,और बेजवाल -तो अध्यात्म अश्या की फितरत का हाल , 
वो कुदरत हुई ,जिससे मख्लूब सब -तो है कर्म ,खल्के -जहां का सबब .II 3 II 
अधिभूत फानी ,वजूदे जहां -पुरुष है अधिदेव रूहे-रवां , 
अधियग ,सुन ऐ फख्रे-अहले वजूद -मैं खुद हूँ ,कि मेरी है तन मन नुमूद .II 4 II 
जब इन्सां जहां से गुजरता हुआ -मेरी ही करे याद मरता हुआ , 
तो फिर इसमे शक का नहीं एहतमाल-उसे मर के हासिल हो मेरा विसाल.II 5 II 
जब इन्सां बदन को करे खैरबाद-करे आखिरी वक्त जिस शै को याद , 
तो अर्जुन ,उसी शै से वासिल हो वो -लगाई थी लौ ,जिस से हासिल हो वो .II 6 II 
मुझे याद अर्जुन ब हर रंग कर -लिए जा मेरा नाम और जंग कर ,
फ़िदा मुझ पे कर दानिशो -दिल तमाम -मेरा वस्ल पायेगा तू लाकलाम .II 7 II 
अगर योग की मश्क हो मुस्तकिल -किसी गैर का जब ख्वाहाँ न दिल ,
हो पुरनूर -आली पुरुष का ख्याल -तो हासी उसी से हो अर्जुन विसाल .II 8 II 
जो करता है यादे खुदाए अलीम -पनाहे जहां ,बादशाहे -कदीम , 
जो सूरज सा पुरनूर ,ज़ुल्मत से दूर - खफी से खफी ,मावराए शऊर .II 9 II 
जो भगती करे योग से मुस्तकिल -जो मरने पे रखता है मजबूत दिल ,
प्राण अपने दो अबरुओं में जमाये-तो पुरनूर आली पुरुष को वो पाए.II 10 II 
सुन अब मुख़्तसर मुझसे वो राहे योग -तजर्रुद में शौक में जिसके योग ,
जहां बे गरज अहले संन्यास जाएँ -जिसे वेद -दां गैर फानी बताएं .II 11 II 
बदन के अगर बंद सब दर करे -जो मन है उसे दिल के अन्दर करे ,
जमे इस तरह योग से उसका ध्यान -कि इन्सां के बस में रहे उसके प्रान.II 12 II 
जिसे 'ओम 'कहते हैं ,नामे खुदा -वो इक रुक्न का हर्फ़ जीता हुआ , 
मेरे ध्यान में जिसका हो इख्तिताम -मिले उसको मरते ही आला मुकाम .II 13 II 
सदा मेरा पैहम जिसे ध्यान है -तो मिलना मेरा उसको आसान है , 
मुझे दिल से अर्जुन भुलाता नहीं- किसी गैर से दिल लगाता नहीं .II 14 II 
महा आत्मा मुझसे पाकर विसाल -रहें पुरसुकूंलेके ओजे कमाल , 
हुलूल औ तनासुख ,न दौरे हयात -फना और मुसीबत से पायें निजात .II 15 II 
कि ब्रह्मा की दुनिया तक अहले जहां -तनासुख के चक्कर में हैं बेगुमां, 
मगर जिसको हासिल हो मुझसे विसाल -बरी है ,तनासुख से ,कुंती के लाल .II 16 II 
जो वाकिफ है राजे -लैलो-नहार -करे वक्त ब्रह्मा का ऐसे शुमार , 
हज़ार अपने युग हों ,तो एक उसका दिन -हज़ार अपने युग की फिर इक रात दिन .II 17 II 
हो ब्रह्मा के दिन जब सहर की नुमूद -तो बातिन से ज़ाहिर हो बज्मे शुहूद , 
मगर जिस घड़ी आये ब्रह्मा की रात -तो बातिन में छुप जाए कुल कायनात .II 18 II 
ये मखलूक पैदा जो हो बार बार -हो गुम ,रात पड़ने पे बे इख्तियार ,
सुन अर्जुन ,जो ब्रह्मा का दिन हो अयां-हो फिर मौजे हस्ती का दरिया र वां .II 19 II 
परे गैब से भी है इक जाते गैब -वो हस्ती ,फना का नहीं जिसमे ऐब ,
किसी की न कुछ बात बाक़ी रहे - फकत इक वही ज़ात बाक़ी रहे .II 20 II 
वो हस्ती जो बातिन है और बेजवाल -करें उसकी मंजिल को आला ख्याल ,
पहुँच कर जहां से न लौटें मुदाम -वही है ,वही मेरा आली मुकाम .II 21 II 
ये दुनिया है जिसकी बसाई हुई -हरेक शै है ,जिसमे समाई हुई '
अगर चाहे तू उस खुदा का विसाल -रख उसकी मोहब्बत का दिल में ख्याल .II 22 II 
सुन ,अय नस्ले भारत के सरताज ,सुन -बताता हूँ अब वक्त के तुझको गुन,
कि कब मर के लौट आयें योगी यहीं -वो मर के कालिब बदलते नहीं .II 23 II 
अगर दिन हो या मौसमे -नारों नूर -उजाले की रातें हों ,मह का ज़हूर ,
हो शश माही सूरज का दौरे शुमाल -मरे इसमे आरिफ तो पाए विसाल .II 24 II 

अन्धेरा हो पाख और धुन्दलका हो खूब -हो शश माह सूरज का दौरे जुनूब , 
कि हो रात का वक्त ,जब जान जाए -तो योगी यही चाँद से लौट आये .II 25 II 
अन्धेरा कभी हो ,उजाला कभी -सदा से जगत के हैं रस्ते यही , 
उजाले में जब जाए वापस न आये -अँधेरे में जाता हुआ लौट आये .II 26 II 
जो इन रास्तों से न अनजान हो -वो योगी परेशां न हैरान हो , 
सुन अर्जुन ,है जब तक तेरे दम में दम -तू रह योग में अपने साबित कदम .II 27 II 
मिले वेद के पाठ करने से पुन्न -हैं बेशक बहुत दान ,यग ,तप के गुन, 
मगर इन से बाला है ,योगी की बात -अजल से वो पाए मुकामे निजात .II 28 II 


      -आठवां अध्याय समाप्त -

















Sunday, June 26, 2011

सातवाँ अध्याय :ज्ञानविज्ञान


ज्ञानविज्ञान -इल्मे मुआरिफत - 


भगवान ने फरमाया - 

सुन अर्जुन अमां मुझमें पाए हुए -मेरी ज़ात में लौ लगाए हुए ,
तुझे योग की मश्क का ध्यान हो -तो सुन किस तरह मेरी पहचान हो .II 1 II 
मैं करता हूँ वह राजे कामिल बयां-करे इल्मो इरफांजो तुझ पर अयाँ,
ये पहचान कर सबको पहचान ले -जो है जानने का ,वो सब जान ले .II 2 II 
हज़ारों में होगा कोई खाल खाल - कि है जिसको फिक्रे हुसूले -कमाल ,
हो उन बा कमालों में कोई बशर -जो मेरी हकीकत की पाए खबर .II 3 II 
ये मिट्टी ,ये पानी ,ये आग और हवा -ये आकाश दुनिया पे छाया हुआ ,
ये दानिश ,ये दिल ,ये ख्याले -खुदी -है इन आठ हिस्सों में फितरत मेरी .II 4 II 
है फितरत तो अदना है ,सुन अय कवी -मगर मेरी फितरत है एक और भी ,
वो फितरत है आला ,बने जो हयात -इसी से तो कायम है कुल कायनात .II 5 II 
इन्हीं फितरतों से है सब हस्तो -बूद -इन्हीं के शिकम से हुए सब वुजूद ,
सो है मुझसे आगाज़े आलम तमाम -मेरी ज़ात में सबका हो इख्तिताम .II 6 II 
सुन अर्जुन नहीं कुछ भी मेरे सिवा -न है मुझसे बढ़कर कोई दूसरा , 
पिरोया है सबको मेरे तार ने -कि हीरे हों जैसे किसी हार में .II 7 II 
मैं पानी में रस,चाँद सूरज में नूर -मैं हूँ "ओम "वेदों में जिसका ज़हूर , 
सिदा मुझको आकाश में कर ख्याल -मैं मर्दों में मर्दी,कुंती के लाल .II 8 II 
मैं मिट्टी के अन्दर हूँ खुशबूए पाक -मैं हूँ आग में शोलए-ताबनाक , 
मैं जानेजहाँ जानदारों में हूँ -रियाज़त,इबादत -गुज़ारों में हूँ .II 9 II 
सुन अर्जुन ,मैं हूँ बीज हर हस्त का -मैं वो बीज हूँ जो न होगा फना , 
मैं दानिश हूँ ,उनकी जो हैं होशियार -मैं ताबिश हूँ उनकी जो हैं ,ताबदार .II 10 II 
मैं हूँ कुव्वतो -जोरे -मर्दे ज़री-मगर हूँ ,हवाओ -हवस से बरी, 
सुन अर्जुन ,मैं ख्वाहिश हूँ इंसान की -जो दुश्मन न हो ,धर्म ईमान की .II 11 II 
मुझी से है फितरत सतोगुन कहीं -मुझी से ,राजोगुन,तमोगुन कहीं , 
मगर मैं बरी इनसे हूँ बिल्यकीं-ये मुझसे हैं ,लेकिन मैं इनसे नहीं .II 12 II 
गुनों से हुए वस्फ़ तीनों अयां-हुए जिससे गुमराह अहले जहां ,
समझते नहीं लोग मेरा कमाल -कि बाला हूँ मैं उनसे ,और बे ज़वाल .II 13 II 
गुनों से जो माया हुई आशकार -ये माया है ,या फितरते -कर्दगार,
कहाँ इससे इन्सां कभी कभी पार हों -फकत पार मेरे परिस्तार हों .II 14 II 
जो गुमराह ,बदकुन हैं और पुर खता -करे ज्ञान गुन उनके माया फना ,
पसंद उनको सीरत है शैतान की -मेरे पास आते नहीं वह कभी .II 15 II 
सुन अर्जुन हैं मेरे परस्तार चार -तलबगार मेरे ,निकूकार चार ,
दुखी शख्स ,या इल्म की जिसको धुन -तलब ज़र की .या हों जिसमे हों ग्यान गुन .II 16 II 
जो ग्यानी है चारों में सरदार है -मुझी में है यकदिल औ सरशार है ,
करे जाते -यकता की भागती सदा -मई प्यारा हूँ उसका ,वो प्यारा मेरा .II 17 II 
परस्तार हर एक गो नेक है -जो ग्यानी है ,मुझसे मगर एक है ,
वो यकदिल है ,और उससे यकदिल हूँ मैं -वो कायम है और ,उसकी मंजिल हूँ मैं .II 18 II 
जनम पे जनम लेके ग्यानी जरूर -पहुँच जाये आखिर को मेरे हुजुर ,
वो जाने "कि सब कुछ है जानेजहाँ -महा आत्मा ऐसा होगा कहाँ .II 19 II 
हवाओ -हवस से जो मजबूर हैं -हुए ज्ञान से उनके दिल दूर हैं ,
करें दूसरे देवताओं से प्रीत -निकालें तबीअत से पूजा की रीत .II20 II 
किसी रूप का भी परस्तार हो -यकीं से इबादत में सरशार हो ,
परस्तार ऐसा भटकता नहीं -मैं करता हूँ ,मजबूत उसका यकीं.II 21 II 
परस्तिश वो जौके यकीं से करे -जिसे देवता मान ले ,मान ले ,
वो पाता है जोरे -यकीं से मुराद -जो दरअस्ल होती है मेरी ही दाद .II 22 II 
जो नादाँ नहीं ज्ञान में होशियार -परस्तिश से फल पायें नापायदार ,
जो देवों को पूजें ,वो देवों को पायें -परस्तार मेरे ,मेरे पास आयें .II 23 II 
मैं चश्मे -जहां से निहां हूँ निहाँ -मगर मुझको नादाँ समझ लें अयां ,
वो मुझको नहीं जानते बे मिसाल -मेरी ज़ात आली है और बे ज़वाल .II 24 II 
कि मैं योगमाया से मस्तूर हूँ -जहां कि नज़र से बहुत दूर हूँ ,
ये मूरख ज़माना नहीं जानता -कि मेरा जमम है ,न मुझको फना .II 25 II 
जो गुजरी हुई हस्तियाँ हैं ,सभी -जो मौजूद हैं अब ,कि होंगीं कभी ,
सुन अर्जुन ,मैं उन सब से हूँ बाखबर -किसी को नहीं इल्म मेरा मगर .II 26 II 
ये धोके की टट्टी है ,इज्दाद सब -ये है शौको नफ़रत कीऔलाद सब ,
इन्हीं से तो ,अर्जुन ये खिलकत तमाम -परागंदा रहती है यूं सुब्हो-शाम .II 27 II 
वो इन्सां ,भले जिनके आमाल हैं -गुनाहों से जो फारिगुलबाल हैं ,
न इज्दाद से उनको धोका न गम -मेरी बंदगी में हैं साबित कदम .II 28 II 
मुझी को समझ कर जो उम्मीदगाह -बुढापे से और मौत से लें पनाह .
उन्हें ब्रह्म की खूब पहचान है-फिर अध्यात्म और कर्म का ग्यान है .II 29 II 
अधिभूत जोलोग मानें मुझे -अधिदेव ,अधियग्य जानें मुझे ,
वो यकदिल हैं ,चित्त उनमे हमवार हैं -दमे नज़अ भी मुझसे सरशार हैं .II 30 II 
        -सातवाँ अध्याय समाप्त -






Friday, June 24, 2011

छठवां अध्याय :आत्मसंयम

-आत्मसंयम -तजकि ए नफ्स -

भगवान ने फरमाया -
सुन अर्जुन जो इन्सां करे सब अमल -फ़रायज बजा लाये ढूँढे न फल , 
वो योगी है ,और संन्यासी जरूर -न वो जो रहे आग किरिया से दूर .II 1 II 
वही जिसको सन्यास कहते हैं लोग -सुन अर्जुन वही है वही खास योग , 
कि खुद योग में मर्दे-कामिल नहीं -जो छोड़े न फिक्रे चुनां ओ चुनीं .II 2 II 
मुनी वो जिसे योग दरकार है -अमल ही अमल जिसका हथियार है , 
मगर योग से जब वो हो कामगार -तो हथियार है उसका सुकूनो करार .II 3 II 
न महसूस अश्या से जिसको लगन -अमल से लगावट न उसमे लगन ,
नहीं जिसको फिक्रे चुनानो चुनीं -कहें योग का उसको मसनद नशीं .II 4 II 
मुनासिब नहीं खुद को इन्सां गिराए -वो खुद को उभारे ,खुद को उठाये ,
कि इन्सान खुद अपना गमखार है -वो खुद अपना बदख्वाहो -गद्दार है .II 5 II 
करे नफ्स को अपने जेरे नगीं-वो ख्वाह अपना गमख्वार है बिल्यकीं,
मगर जिसको काबू नही नफ्स पर -वो दुश्मन है अपने लिए सरबसर .II 6 II 
जिसे नफस पर अपने है इख़्तियार -उसी को परमात्मा में करार , 
हो गरमी कि सर्दी ,हो गम या ख़ुशी -हो इज्जत कि जिल्लत हैं यकसां सभी. II 7 II 
वो सरशार योगी रहे इस्तवार-मिले इल्मो इरफांमें जिसको करार , 
हवास उसके हैं ,जेरे मजबूत दिल -हैं यकसां उसे ,जर हो मिट्टी की सिल .II 8 II 
वो योगी है अफजल जिसे हों सब एक -सगे ,दोस्त ,अहबाब बेलाग नेक , 
हों सालिस कि दुश्मन ,दिल आजार हों -वो धरमातमा हों कि बदकार हों .II 9 II 
जो योगी हैं ,वो योग तन्हा कमाए -अलग रह के दिल आत्मा में लगाए , 
रहे उसके काबू में तन हो कि मन -उमीदो हवस से न हो कुछ लगन .II 10 II 
कुशाघास पर मिरगछाला बिछाए -फिर उस मिरगछाला पे चादर लगाए , 
जमा उस पे आसन करे ऐतकाफ-न ऊंची न नीची जगह पाक साफ़ .II 11 II 
सुकूं चित को दे ,लौ मुझी से लगाए -हवासो तखय्युल को काबू में लाये , 
जमे अपने आसन पे वो मुस्तकिल -करे योग को साध कर पाकदिल .II 12 II 
सरो -पुश्तो -गरदन झुकाए न वो -बदन को हिलाए डुलाये न वो ,
जमाये नज़र नाक की नोक पर -निगाहें न भटकें इधर और उधर .II 13 II 
रहे पुरसुकूं ,बे खतर मुस्तकिल -तजर्रुद पे कायम हो ,काबू में दिल ,
मेरी ज़ात से लौ लगाये हुए -मेरे ध्यान में दिल जमाये हुए .II 14 II 
अगर योग वो यूं कमाता रहे -तो मन उसका काबू में आता रहे ,
सुकूं आत्मा में समा जाएगा -वही मेरा निर्वान पा जाएगा .II 15 II 
न हासिल करे योग बिसयार -खार -न वो जिसका हो भूक से हाल जार ,
बहुत सोनेवाला भी पाए न योग -बहुत जागने से भी आये न योग .II 16 II 
हो योगी के हर काम में ऐतदाल-गिज़ा और आराम में ऐतदाल,
मुनासिब ही जाग ,और मुनासिब ही ख़्वाब -मिटाता है योग ,उसके दर्दो अज़ाब .II 17 II 
अगर उसके काबू में दायम हो मन -फकत आत्मा में कायम हो मन ,
रहे लज्ज़ते -नफ्स से दूर -वो सरशार है योग में बिल्जरूर .II 18 II 
हवा की न हो मौज ,जुम्बा की रौ-तो लरजे कहाँ शम्मे रौशन की लौ , 
यही होगा योगी को हासिल सबात -ख्याल उसके बस में ,तो मन महवे जात .II 19 II 
जहां मन को आये सुकूनो करार -रियाजत करे दिल का दूर इन्तिशार , 
जहां मन में हो आतमा का ज़हूर -करे मुतमइन आत्मा का सुरूर .II 20 II 
जहां बेनिहायत हो राहत नसीब -हिसों से बईद और खिरद के करीब , 
जहां हो हकीकत से इन्सां न दूर -रहे आत्मा में कयामो सुरूर .II 21 II 
जहां उसको मिलने से आये यकीं-कि दौलत कोई इससे बढ़कर नहीं , 
जहाँ इस में जम कर वो आजाये सुख -कि जुम्बिश न दे उसको दुनिया का दुख.II22 II 
जहां गम है बाक़ी न कुछ सोग है -यही योग है ,हाँ यही योग है , 
इसी योग में दिल यकीं से जमाओ -इसी योग से तुम अकीदत दिखाओ .II 23 II 
ख्यालों की औलाद हिर्सो हवा -इन्हें यक कलम दूर करता हुआ , 
हवास अपने हर सिम्त से घेर कर -दिली ज़ब्त से उनका रुख फेर कर .II 24 II 
जिसे अक्ल पर अपनी हो इख्तियार -वो हासिल करे रफ्ता रफ्ता करार ,
करे उसका मन आत्मा में कयाम -न उसको ख्याले दुई से हो काम .II 25 II 
मन इन्सां का चंचल है और बेकरार -रहे दौड़ता ,भागता बार बार ,
वो भागे तो ,बाग़ उसकी झट मोड़ दे -हिफाजत में फिर रूह की छोड़ दे .II 26 II 
वो योगी जिसे मन में आये सुकूं- सतोगुण से दिल जिसका पाए सुकूं ,
खुदा से हो वासिल ,गुनाहों से दूर -उसी को मुयस्सर हो आला सुरूर .II 27 II 
जो योगी रहे योग में इस्तवार-गुनाहों से दामन न हो दागदार ,
उसी को मिले नेमते बेकराँ-की पाए विसाले खुदाए -जहां .II 28 II 
अगर योग में नफ्स सरशार है -तो फिर ये हकीकत नमूदार है ,
की हर शै में है आत्मा की नुमूद -तो हर शै का है आत्मा में वुजूद .II 29 II 
जो हर सिम्त पाता है मेरा ही नूर -मुझी में जो हर शै का देखे ज़हूर ,
कभी मुझ से मुंह मोड़ सकता नहीं -कभी मैं उसे छोड़ सकता नहीं .II 30 II 
जो कसरत में वहदत का देखे समां-जो पूजे मुझे ,हूँ जो सब में अयाँ, 
वो योगी रहे गो किसी ढंग में -मुझी से हो वासिल वो हर रंग में .II 34 II 
सुख औरों का समझे जो अपना ही सुख -दुख औरों का समझे अपना ही दुख , 
जो सबका करे अपने जैसा ख्याल -सुन अर्जुन ,कि योगी है वो बाकमाल .II 35 II 
अर्जुन का सवाल - 
सुकूं का जो मुझको सिखाया है योग -मेरे दिल को भगवान भाया है योग , 
बिना इसकी लेकिन नहीं मुस्तकिल -कि चंचल है ,चंचल है ,चंचल है दिल .II 36 II 
ये भगवान ,बेकल है पुरशोर दिल -कि सरकश है ,मुंहजोर , जिद्दी है दिल , 
न काबू में आये किसी चाल में -हवा बंद होती नहीं जाल में .II 34 II 
भगवान का इरशाद - 
कहा सुन के भगवान ने ,अय कवी -दिल इंसां का पुरशोर चंचल सही , 
है वैराग और मश्क में ये कमाल -दी आजाये काबू में कुंती के लाल .II 35 II 
अगर नफ्स पर जब्ते कामिल नहीं -तो फिर योग इंसां को हासिल नहीं , 
मगर नफ्स पर हो जिसे इख्तियार -मुनासिब वसाइल से हो कामगार .II 36 II 
अर्जुन का सवाल - 
फिर अर्जुन ने पूछा भटकता है जो -इसी राह में सर पटकता है जो , 
मुकय्यद तो है ,जां-फ़िशानी नहीं -अकीदत से पहुंचेगा वो भी कहीं .II 37 II 
कवी दोस्त ,जो मोह में फंस गया -रहे हक़ में जो डगमगाता रहा , 
तो क्या वो यहाँ ,और वहां से गया -जो बादल फटा आसमां से गया .II 38 II 
करें मेरे इस शक को भगवान दूर -तबीयत को हासिल हो इरफांका नूर , 
कोई दूसरा है जहां में कहाँ -करे दूर मेरे जो वहमो -गुमां.II 39 II
भगवान ने फरमाया -
सुन अय प्यारे अर्जुन ,वो इन्सान भी -न दौनों जहाँ में फना हो कभी ,
कि दुनिया में जो नेक किरदार है -तबाही में कब वो गिरफ्तार है .II40 II
ये सच है उसे योग हासिल नहीं -हो नेकों की दुनिया में जाकर मकीं ,
बहुत मुद्दतों में वो ले फिर जनम -वहां हों जहां नेकी और ,न वहम .II 41 II
वो हो वर्ना ऐसे घराने का लाल -हों योगी जहाँ आकिलो -बाकमाल ,
जनम ऐसा मुश्किल मिले अय हबीब -सआदत ये हो सादो -नादिर नसीब .II42 II 
वो दुनिया में पाए जो ताजा हयात -हों सब उसमे पिछले जनम के सिफात , 
करे बढ़ के पहले से कसबे-कमाल -कि तकमील हासिल हो ,जाए जवाल .II 43 II 
इसी साबिका मश्क के जोर से -वो मकसूद की सिम्त बढ़ता चले , 
हुआ योग का इल्म जिसको पसंद -वो वेदों के लिक्खे से जाए बुलंद .II 44 II 
किये जा रहा है जो योगी जतन-तो पापों से हो पाक साफ़ उसका मन , 
जनम पर जनम लेके पाए कमाल -कि हासिल हो आखिर खुदा का विसाल .II 45 II 
तपस्वी से आला है योगी कि शान -बड़ी उसकी ग्यानी से भी आनबान , 
हैं कम उस से जो कर्मकांडी है लोग -फिर अर्जुन है क्या देर ,ले तू भी योग .II 46 II 
वो योगी ,यकीं जो मुझी पर जमाये -मुझी में फकत आत्मा लगाए , 
जो मेरी परस्तिश में शागिल रहे -वो सब योग वालों में कामिल रहे .II 47 II 
- छठवां अध्याय समाप्त -
































Wednesday, June 22, 2011

पांचवां अध्याय :कर्मसंयास योग


-   कर्मसंयास -तर्के अमल 

अर्जुन ने कहा - 
कभी कर्मयोग आप अच्छा बताएं -कभी कर्म संन्यास के गुन गिनाएं , 
है भगवान कौन इनमे मरगूबतर -अमल है ,कि तर्के अमल खूबतर .II 1 II 
भगवान का जवाब - 
कही सुन के भगवान ने फिर ये बात -है तर्क ,और अमल दौनों राहे निजात , 
फजीलत में है लेकिन बढ़कर अमल -कि तर्के अमल से है बेहतर अमल.II 2 II 
सदा संनियासी उसे जानिये -हो नफ़रत किसी से न रगबत जिसे , 
मुकय्यद न पाबन्दे इज्दाद है -सुन अर्जुन वही मर्दे-आजाद है.II 3 II 
वो हैं तिफ्ले नादाँ जहालत में गर्क -जो संन्यास और योग में पायें फर्क , 
जो दौनों से इक में भी कामिल हुआ -तो फल उसको दौनों का हासिल हुआ. II 4 II 
तुम्हें सांख्य से जो मिलेगा मुकाम -वही योग से पायेगा लाकलाम . 
जरा देख रखना ,अगर आँख है -वही योग है और वही सांख है .II 5 II 
रहे -योग से जो किनारा करे -तो मुश्किल है संन्यास पाना उसे , 
मुनी ,योग ही में जो कामिल हुआ -विसाले -खुदा उसको हासिल हुआ .II 6 II 
जो सरशार हैं योग में मुस्तकिल -हवास उनके बस में हैं ,वो साफ़दिल,
जिसे जान अपनी सी हर जान है -कहाँ उसको कर्मों से नुकसान है .II 7 II 
हकीकत का है जिसको इल्मो -यकीं -समझता है 'मैं कुछ करता नहीं ,
सुने, देखे ,छूए ,कभी सूँघ ले -वो खाए ,फिरे ,साँस ले ,ऊंघ ले .II 8 II 
वो दे ,और ले ,और बोले कभी -कभी आंख मूंदे तो खोले कभी ,
मगर वो हमेशा ये कर ले कयास -कि 'महसूस की सैर देखें हवास .II 9 II 
रहे बे तअल्लुक करे जब अमल -खुदा ही की खातिर करे सब अमल ,
खता से हमेशा रहेगा बरी-कमल के न पत्ते पे ठहरे तरी .II 10 II 
जो योगी है करते हैं निष्काम काम -नहीं कम में कुछ लगावट का नाम ,
लगाएं वो तन ,मन ,खिरद और हवास -कि दिल की सफाई से हों रूशनास.II 11 II 
जो योगी है ,सरशार छोड़ेगा फल -सुकूने -अबद लायें उसके अमल .
जो योगी नहीं ,वो हवस का फकीर -रहे फल की खाहिश में हरदम असीर .II 12 II 
ये नौ दर की इक राजधानी है तन -रहे चैन से जिसमे शाहे बदन , 
करे खुद न ,कोई औरों से काम -करे तर्क एमाल दिल से मुदाम .II 13 II 
वो मालिक ,अमल और न आमिल बनाए -न कर्मों को कर्मों के फल से मिलाये , 
ये माया की हैं कार फरमाइयां -ये मया ही करती है सबकुछ अयाँ.II 14 II 
न लेगा किसी से भी परमात्मा -किसी की निकोई किसी की खता , 
जहालत है इरफां पे छाई हुई -तो दुनिया है चक्कर में आई हुई .II 15 II 
मगर जिनको हासिल है इरफां का नूर -करे ज्ञान उनकी जहालत को दूर ,
कि सूरज हो जब ज्ञान का जू फिशां-तो परमात्मा की हो सूरत अयाँ .II 16 II 
जो दें रूह और अक्ल ,इसमे लगा -उसी में हों कायम ,उसी पर फ़िदा ,
पूंछ जाये उस तक तो वापिस न आयें -करे ज्ञान दूर उनकी सारी खताएं .II 17 II 
जो ज्ञानी है ,यकसां नजर उसको आय -वो हाथी हो, कुत्ता हो ,या कोई गाय ,
वो हो बिरहमन आलिमो बुर्दबार -कि चंडाल ,नापाक मुरदार ख्वार .II 18 II 
मुसावत में दिल लगाए हुए -जमम पर वो काबू है पाए हुए , 
वो बेऐब ओ यकसां जो जाते खुदा -रहे जात में उसकी कायम सदा .II 19 II 
वो आरिफ खुदा में रहे इस्तवार-न उलझन उसे हो ,न दिल बेक़रार , 
मुसर्रत जो पाए तो शादाँ न हो -मुज़र्रत जो पहुंचे ,परेशां न हो .II 20 II 
न अश्याये जाहिर से उसको लगन -है आनंद से आत्मा में मगन , 
जिसे ब्रह्मयोग से ही सरोकार है -दवामी मुसर्रत में सरशार है. II 21 II 
तअल्ल्लुक से पैदा जो होता है सुख -उसी से नुमायाँ हो आखिर में दुख,
जो सुख का भी आगाज़ो अंजाम है -तो दाना कहाँ उस से खुशकाम है .II 22 II 
न छोड़ा अभी जिसने तन का कफस -मर कर लिए ज़ेर तैशो हवस ,
असीरे बदन रह के ,आजाद है -तो इन्सां वो योगी है दिलशाद है .II 23 II 
वो योगी रहे जिसके दिल में सुरूर -मुसर्रत हो मन में तो सीने में नूर ,
समझ लीजिये हक़ से वासिल उसे -कि हो ब्रह्मनिर्वाण हासिल उसे .II 24 II
ऋषि,मिट गए जिनके जुर्मो कुसूर -जिन्हें खुद पे काबू ,दुई से जो दूर ,
जो सबकी भलाई के खाहाँ रहें -मिले ब्रह्म निर्वाण आखिर उन्हें .II 25 II 
न गुस्सा है जिनमे न रंगे हवस -ख्यालो -तबीअत पे है जिनका बस ,
मिला आत्मा का जिन्हें ज्ञान है -उन्हें हर तरफ ब्रह्म निर्वान है .II 26 II 
मुनि जो न महसूस से दिल लगायें -मियाने -दो अब्रू नजर को जमायें ,
बुरूं और दरूँ के बराबर हों दम -मसावी चले नाक से जेरो बम .II 27 II 
हवासो -दिलो अक्ल कर ले जो राम -तलाशे -निजात ,उसका दिन रात काम,
न डर है ,न गुस्सा ,न लालच कभी -निजात उस मुनी को मिले बिल यकीं .II 28 II 
मुझे शाहे अर्जो-समां जो कहे -जो समझे है यग,तप,मेरे ही लिए 
जो मने मुझे खल्क का गमगुसार -उसी को मिलेगा सुकूनो करार .II 29 


   -पांचवां अध्याय समाप्त -

















Monday, June 20, 2011

चौथा अध्याय .ज्ञानंकर्म सन्यास


 - ज्ञानकर्म संन्यास -आरिफाना तर्केअमल -

भगवान ने फरमाया - 
यही योग जिसको नहीं है फ़ना -विवस्वान को मैंने पहिले दिया . 
मनू ने लिया फिर विवस्वान से -मनू से लिया इसको इक्ष्वाक ने .II 1 II 
यही नस्ल दर नस्ल आया है योग -यही राज ऋषियों ने पाया है योग . 
मगर अब है दौरे जहाँ में ये हाल -कि इस योग को आगया है जवाल.II 2 II 
यही योग का आज राजे -कदीम -बताया है मैंने तुझे अय नदीम. 
किया तुझ पे सर्रे ख़फ़ी आशकार -कि तू भक्त मेरा है ,और दोस्तदार .II 3 II 
अर्जुन का सवाल -
कहा सुनके अर्जुन ने सुनिए हुजूर -जहाँ में हुआ आपका अब जहूर .
विवस्वान पहिले ही मौजूद था -तो योग आपसे उसने क्योंकर लिया .II 4 II 
भगवान ने कहा -
सुन अर्जुन हुए हैं यहाँ बार बार -तुम्हारे हमारे जनम बेशुमार .
मुझे हाल इन सबका मालूम है -तेरा हाफिजा इन से महरूम है.II 5 II 
मेरी ज़ात है मालिके कायनात -न इसको विलादत न इसको ममात .
जो काम अपनी फितरत को लाता हूँ मैं -ज़हूर अपनी माया से पाता हूँ मैं .II 6 II 

तनज्जुल पे जिस वक्त आता है धर्म -अधर्म आके करता है बाज़ार गर्म .
ये अंधेर जब देख पाता हूँ मैं -तो इन्सां की सूरत में आता हूँ मैं .II 7 II 
भलों को बुरों से बचाता हूँ मैं-बुरों को जहाँ से मिटाता हूँ मैं .
जड़ें धर्म की फिर जमाता हूँ मैं -अयाँ होके युग युग में आता हूँ मैं .II8 II 
जो अर्जुन समझ ले इन इसरार को -खुदायी जनम और किरदार को .
वो मर कर मेरे वस्ल से शाद है -तनासुख के चक्कर से आज़ाद है.II 9 II 
कई मह्व मुझ में मुझी में मुकीम -तअल्लुक से आजाद बे रंजो बीम , 
सदा ज्ञान ,ताप से करें पाक दिल -मेरी जाते आली में जाते हैं मिल.II10 II 
मेरे पास जिस राह से लोग आयें -वो राजी हों ,अर्जुन मुराद अपनी पायें , 
इधर से चलें ,या उधर से चलें -मेरे सब हैं रस्ते जिधर से चलें .II 11 II 
वो कर्मों के फल के तालिब यहाँ -करें देवताओं की कुर्बानियां , 
कि फिल्फौर दुनियां में इन्सान की-मुरादें हों कर्मों से हासिल सभी .II 12 II 
बनाये हैं मैंने जो ये वर्ण चार -कि कर्मों ,गुणों की तकसीमे कार. 
मैं खालिक हूँ इनका ,मगर बिल्जरुर -अमल से बरी हूँ ,तगय्युर से दूर .II 13 II 
न कर्मों का होता है मुझ पर असर-न कर्मों के फल पर है मेरी नजर . 
जो ऐसा समझता मुझे पाक है -वो कर्मों के बंधन से बेबाक है .II 14 II 
सुलफ के बुजुर्गों से पाकर ये बात -किये काम दुनिया में बहरे निज़ात. 
इसी तरह तू भी किये जा अमल-बुजुर्गों के नक़्शे कदम पे ही चल.II 15 II
सुन अब मुझसे कर्मों अकर्मों का राज़ -न दाना भी जिनमे करें इम्तियाज़ . 
बताता हूँ कर्मों का रस्ता तुझे -जो आज़ाद कार देगा संसार से .II 16 II 
ये लाजिम है कर्मों को पहचान तू -बुरे कर्म जो हैं उन्हें जान तू. 
अकर्मों से कर्मों को करले जुदा -कि गहरा है कर्मों का रिश्ता बड़ा .II 17 II 
वो इन्सां जो कर्मों में देखे अकर्म -अकर्म उसको आये नज़र ऐन कर्म . 
वो लोगों में दाना है और होशियार -वो योगी है ,गो सब करे कारोबार .II 18 II 
न खाहिश कि हो काम में जिसके लाग -जला दे अमल जिसके इर्फाँ की आग . 
अमल में समर से जो है बेनियाज़ -है दाना वही पेशे दानाए राज़ .II 19 II 
अमल में नहीं जिसको फल से लगन -दिले मुतमइन में रहे जो मगन . 
सहारा किसी का न ले एक पल -अमल उसका है ,ऐन तर्के अमल .II 20 II 
उमीदो हवस से न है कुछ लगन -जो काबू है मन तो कब्जे में तन . 
जो तन काम में ,मन रहे ध्यान में -तो पल भी न गुजरेगी असियान में .II 21 II 
जो मिल जाये लेकर वही शाद है-न हासिद न पबंडे इज्दाद है ,
बराबर है जिसके लिए जीतहार -अमल में अमल का नहीं वो शिकार .II 22 II 
तअल्लुक से जो पाक आज़ाद है -जो इरफां में कायम है दिलशाद है ,
अमल यग की खातिर करे जो सदा -तो कर्म उसके होते हैं सरे फ़ना .ई 23 II 
को किरिया में देखे खुदा ही खुदा -है अगनी खुदा ,और हवि भी खुदा ,
हवं और हवं करने वाला वही-खुदा से जुदा वो न होगा कभी .II 24 II 


कई कर्मयोगी हैं इन से अलग -वो बस देवताओं को देते हैं यग. 
जलाकर कई आतशे किब्रिया -करें यग को इस यग के अन्दर फना .II 25 II 
कई जब्ते दिल से जलाएं मुदाम -समाअत .हिसें,दूसरी भी तमाम . 
कई हिस की आतिश में कर दें फना -सब अश्याए -महसूस मिस्ले सिदा.II 26 II 
कई जब्त से योग ऐसा कमायें -दिलो जां में इरफां की आतिश जलाएं , 
हों अफआले हिस ,या हों अफआले दम -इसी ज्ञान अगनी में कर दें भसम .II 27 II 
कई धन से और तप से करते हैं यग -कई योग और जप से करते हैं यग ,
कई लोग करते हैं यग ज्ञान से -वो अहद अपना पूरा करें जान से.II 28 II 
कई हिसे -दम में दिखाएँ कमाल-की यग उनका है रोकना दम की चाल,
वो दम अपने करते हैं कुरबान यूं -दुरूं में बरूं और बरूं में दुरूं.II 29 II 
कई रखके ज़ब्ते गिजाये बदन -करें प्रान पर प्रान अपने हवन,
उन्हें यग के इसरार मालूम हैं -वो यग के सबब पाक मासूम हैं .II 30 II 
वो अमरित के लुकमे जो यग से बचें -उन्हें खानेवाले खुदा में रचें,
हे अर्जुन ,वो महरूम छोड़े जो यग -न ये यग ही उसका ,न अगला ही यग .II 31 II 
बहुत यग के आमालो दस्तूर हैं -जो ब्रह्म ,यानी वेदों में मज़कूर हैं ,
की ये सारे कर्मों की औलाद हैं -जो ऐसा समझ ले आज़ाद है .II 32 II 
करे साजो सामां से इन्सान यग -मगर सबसे बेहतर समझ ज्ञान यग ,
सुन अर्जुन ,अगर तुझको पहचान है -की हर कर्म की इन्तहा ज्ञान है.II 33 II 
जो ज्ञानी हैं ,तू उनकी ताजीम कर-हुसूल उनसे इरफांकी तालीम कर . 
समझ इनसे सबकुछ ब इज्जो नियाज़ -तू कर इनकी सेवा ,तू सीख इनसे राज़.II 34 II 
जो अर्जुन मिले ज्ञान उलझन हो दूर -तो हो इस हकीकत का तुझ पे ज़हूर , 
कि सारा जहाँ है तेरी ज़ात में -तरी जात यानि मेरी जात में .II 35 II 
जो फ़ासिक है तू ,या गुनहगार है -गुनहगार बन्दों का सरदार है , 
तो फिर ज्ञान नैय्या पे हो जा सवार -गुनाहों के सागर से कर देगी पार .II 36 II 
सुन अर्जुन जो अम्बारे खाशाक है-लगे आग इसमे तो सब खाक है ,
यूँही ज्ञान अगनी से जाते हैं जल -बुरे हों अमल या भले हों अमल .II 37 II 
नहीं शै जहां में कोई ज्ञान सी -करे पाक फितरत जी इन्सान की,
अगर पुख्तगी योग में पायेगा -तो खुद्ज्ञान भी उसका हो जायेगा .II 38 II 
वो ज्ञानी है ,जिसको हो पुख्ता यकीं -हवास अपने रक्खे जो जेरे नगीं,
उसे ज्ञान हासिल हो अन्जमाकार -वो पाए खुदाई -सुकूनो करार .II 39 II 
वो जाहिल ,नहीं जिस का दिल पे यकीं-तजबजब से पहुंचे फ़ना के करीं ,
रहे डगमगाता न हो शादमां-ये दुनिया है उसकी न अगला जहां .II 40 II 
किया योग से जिसने तर्के अमल -कटे ज्ञान से जिसके वहमो खलल .
वही,आतमा का जिसे ज्ञान है -कहाँ उसको कर्मों से नुकसान है.II 41 II 
जहालत से पैदा हुए हैं जो शक -मिटा ज्ञान की तेग से यक बयक ,
उठ अय भारत ,और छोड़ सब वहम ए हाम-तू रख योग में दिल को कायम मुदाम .II 42II


- चौथा अध्याय समाप्त -