Friday, July 08, 2011

चौदहवाँ अध्याय :गुणत्रय विभाग

-गुणत्रय विभाग -तकसीमे सिफ़ाते सहगाना - 

भगवान का इरशाद -
फिर अर्जुन से भगवान बोले कि,सुन -जो ग्यानों का है ज्ञान सुन उसके गुन ,
मुनी जिसको ये ज्ञान हासिल हुआ -कमले फजीलत से वासिल हुआ .II 1 II 
जो लेते हैं इस ज्ञान का आसरा -वो यकरंग हो जाएँ मुझसे सदा ,
जो पैदा हो दुनिया ,तो आयें न वो -फना हो तो तकलीफ पायें न वो II 2 II 
शिकम है मेरी कुदरते कामिला -जो मैं तुख्म डालूं तो हो हामिला ,
यही है महाब्रह्म अस्ले हयात -कि भारत इसी से हो कायनात .II 3 II 
किसी पेट से कोई पाए जनम -हो अर्जुन कोई शक्ल ,कोई शिकम , 
शिकम है महाब्रह्म ,मैं बाप हूँ -कि बीज उसमे डालता आप हूँ .II 4 II 
नमूदार माया से हों तीन गुन-सतोगुन,रजोगुन,तमोगुन ये सुन , 
जो है लाफना रूह तन में मकीं -ये गुन कैद करते हैं उसको वहीं .II 5 II 
सतोगुन की फितरत है पाकीजा नूर -न ऐब इसमे ,अर्जुन न कोई कुसूर , 
करे रूह को शौके -राहत से कैद -करे रूह को जौके -दानिश का सैद .II 6 II 
रजोगुन की फितरत है जज्बात की -है संगीत से इसकी और तिश्नगी ,
ये जौके अमल का बनाती है जाल -करे रूह को कैद ,कुंती के लाल .II 7 II 
तमोगुन जहालत की औलाद है -कब इस से मकीं ,तन से आजाद है ,
करे कैद धोके से भारत इसे -करे ख्वाबो -गफलत से गारत इसे .II 8 II 
सतोगुन का रहता है सुख से लगाव -रजोगुन का शौके अमल है सुभाव ,
तमोगुन का परदा पड़े ज्ञान पर -तो गफलत मुसल्लत हो इंसान पर .II 9 II 
सतोगुन का जिस वक्त बाला हो दस्त -रजोगुन ,तमोगुन रहें उस से पस्त ,
रजस से सतोगुन ,तमोगुन दबे -तमस से ,सतोगुन ,रजोगुन घटे .II 10 II 
बदन है मकां ,और हवास इसके दर -अगर दर है रौशन तो रौशन है घर ,
अगर ज्ञान का नूर हो जूफिशाँ-सतोगुन के गल्बे का है ये निशाँ .II 11 II 
रजोगुन का गलबा हो अर्जुन अगर -तो हो जाएँ हिर्सो -हवा जोर पर ,
तमन्ना हो ,कोशिश हो ,और पेचो -ताब -राजे शौक किरदार में इज्तिराब.II 12 II 
तमोगुन जब इन्सां में हो जोर पर -तो हो मोह गालिब ,कुरु के पिसर ,
अँधेरा तबीयत पे छा जाएगा -जमूद उसको गाफिल बना जाएगा II 13 II 
सतोगुन जो ग़ालिब हो इन्सान पर -इसी हाल में मौत आये अगर ,
मकीं तन का पाए पवित्तर मुकाम -वो सिद्धों की दुनिया में जाए मुदाम .II 14 II
रजोगुन में इन्सां अगर जान दे -जनम अहले किरदार में आके ले ,
तमोगुन में मर कर जो जिन्दों में आये -दरिदों ,परिंदों ,चरिन्दों में आये .II15 II
जो करता है इन्सां सतोगुन अमल -तो पाता है ,पाकीजा और नेक फल , 
रजोगुन अमल से मिले पेचो -ताब -तमोगुन अमल में ,जहालत का बाब .II 16 II 
सतोगुन से इरफां का पैदा हो नूर -रजोगुन से हिर्सो -हवा का जहूर , 
तमोगुन से धोका भी ,गफलत भी हो -तबीयत पे ग़ालिब ,जहालत भी हो .II 17 II 
सतोगुन से जाएँ सूए आसमां-रजोगुन से लटके रहें दरमियाँ , 
तमोगुन का गुन है ये सबसे रजील -ये पस्ती दे डाले ,ये कर दे रजील .II 18 II 
जो अहले बसीरत हैं अहले नजर -गुनों को समझते हैं कारगर , 
मुझे मानते हैं गुनों से बुलंद -तो वासिल मुझी से हों वो अर्जमंद II 19 II 
बदन का है तीनों गुनों पर मदार -मकीने बदन ,गर करे इनको पार , 
वो चहकता है अमृत ,वो पाटा है सुख -न जीना ,न मरना ,न पीरी का दुख.II 20 II 
अर्जुन का सवाल - 
फिर अर्जुन ने पूछा कि अय कर्दगार-वो इन्सां जो जाता है ,तीनों से पार , 
चलन क्या है उसका ,अलामात क्या -वो तीनों गुनों से हो क्योंकर रिहा .II 21 II 
भगवान का इरशाद -
सुन अर्जुन ,सतोगुन से हासिल हो नूर -रजोगुन से कुव्वत ,तमस से फितूर ,
है कामिल जिसे इनकी चाहत नहीं -जो हों ,तो उसे उनसे नफ़रत नहीं II 22 II 
जो इन्सां गुनों से रहे बेगरज-न बेकल हो इनसे ,न रक्खे गरज ,
जो समझे कि करते हैं गुन ही ये काम -रहे पुर सुकूं खुद में कायम मुकाम .II 23 II 
जो सुख दुख में यकसां ,जो है मुस्तकिल -बराबर जिसे जर हो ,कि मिट्टी की सिल ,
मुसावी पसंदीदा और नापसंद -हो तहसीं कि नफ़रत ,वो सब से बुलंद .II 24 II 


न जिल्लत की परवा ,न इज्जत की भूक -करे दोस्त -दुश्मन से यकसां सलूक ,
गरज त्याग दे ,मुझपे सब कारोबार -समझ लो गुनों से वो होता है पार .II 25 II 
जो खादिम मेरा ही परस्तार है -जो मेरी ही मस्ती में सरशार है ,
हो तीनों गुनों से न क्यों पार वो -है वसले -खुदा का सजावार हो .II 26 II 
मेरी ज़ात ही ब्रह्म का है मुकाम -सबातो बका मुझी में कयाम .
मैं दीने अजल का भी हूँ आसरा -मेरी जाते आली ,मैं राहत सदा .II 27 II 


-चौदहवाँ अध्याय समाप्त -
















Thursday, July 07, 2011

तेरहवां अध्याय :क्षेत्र क्षेत्रज्ञ

-:क्षेत्र क्षेत्रज्ञ  -इम्तियाजे जिस्मो जां-


भगवान ने फरमाया -
तुझे अब बताता हूँ ,कुंती के लाल -कि ये जिस्म इक खेत की है मिसाल , 
है इस खेत का राज जिस पर अयां-कहें खेतरग्य उसको सब राजदां .II 1 II 
समझ खेत का राजदां हूँ तो ,मैं -कि हर खेत के दरमियाँ हूँ ,तो मैं , 
जो ये खेत और खेतरग का है इल्म -मेरी राय में सबसे आला है इल्म .II 2 II 
सुन अर्जुन ,है क्या खेत ,क्या इसके गुन-तगय्युर हों कैसे ,कहाँ से ,ये सुन , 
है कौन ,और क्या ,कुव्व्वते-राजदां-मैं करता हूँ ,अब मुख़्तसर सा बयां .II 3 II 
ये ऋषियों ने गाया कई रंग से -बहुत मीठे छंदों के आहंग से , 
ये ब्रह्म सूत्रों में भी मस्तूर है -यही बा दलील उनमे मजकूर है.II 4II 
अनासिर ,अहंकार ,अक्ले-मुहीत -ये दिल,दस हवास,और ये फितरत बसीत ,
करें जिनको महसूस पाँचों हवास -ये आवाज ,शश जायका ,रंगों -बास .II 5 II 
ये सुख दुख,ये नफ़रत तरगीब भी -खिरद ,पायेदारी भी तरकीब भी ,
ये हैं खेत ,और इनकी तब्दीलियाँ -इन्हीं का है ये मुख़्तसर सा बयां .II 6 II 
मैं करता हूँ अब ज्ञान के गुन शुमार -ये हैं ,रास्ती ,इल्म ,उफू ,इन्किसार ,
अहिंसा भी ,और खिदमत उस्ताद की -दिली पुख्तगी ,जब्त ,पाकीजगी. II 7 II 
न होना सरोकार लज्जात से -किनारा ,अहंकार की बात से ,
यही गौर करना कि,लें छीन सुख -जनम ,मौत ,पीरी ,मरज दर्दो दुख .II 8 II 
न बाबस्तागी रिश्त ओ बंद से -न घर से ,न जन से ,न फरजंद से ,
तवाजन से होना ,सुकूनो करार -गवारा हो सूरत कि हो नागवार .II 9 II 
फकत धारना मेरी भक्ती का योग- दुई का न होना ज़रा दिल में रोग ,
अलग रह के महसूस करना सुरूर -हुजूमे खलायक से होना नुफूर .II 10 II 
ख़याल अद्धियातम का शामो -सहर -हकीकत के मकसद पे रखना नजर,
ये इल्मों का इल्म ,ये ज्ञान है -खिलाफ इसके जो है ,अज्ञान है.II 11 II 
सजावार इरफां है वो पाकजात-कि है इल्म ही उसका आबे हयात ,
वो बे इब्तिदा ,लम यजल,जी हशम-न सत या असत कह सकें जिसको हम .II 12 II 
उसी के हैं सब दस्तो पा चारसू -उसी का रूखे रूनुमा चारसू ,
उसी के नजर ,कान ,सर ,हर तरफ -मुहीते जहां सरबसर हर तरफ.II 13 II 
बजाहिर नहीं गरचे उसके हवास -दरख्शां सिफ़ाते हवास उसके पास ,
वो है बे तअल्लुक मगर सबका रब -गुनों से बरी,और गुन उसमे सब .II 14 II 
किसी शै में जुम्बिश ,किसी में सूकूं -वो मौजूद सब में दरूँ और बरूं ,
लतीफ ऐसा ,एहसास माजूर है -वही है करीब ,और वही दूर है . II 15 II 
मुहाल उसकी तकसीम ,अय जी शऊर -मगर उसका हर शै में हिस्सा जरूर ,
सजावार ईरफां वो परवरदिगार -फना और बका पर उसी का मदार .II 16 II 
वही जात नूरुन -अला नूर है -जो तारीकियों से बहुत दूर है .,
वो ईरफां का हासिल भी मकसूद है -वो ईरफां भी हर दिल में मौजूद है.II 17 II 
तुझे मुख़्तसर तौर पर कह दिया -कि इर्फानो मकसूदे ईरफां है क्या ,
बताया तुझे खेत का मैंने हाल -जो समझे मेरा भक्त पाए विसाल .II 18 II 
ये माया अनादी है ,ला इब्तिदा -इसी तरह ला इब्तिदा आत्मा ,
गुन अश्या के और उनकी शक्लें अनेक -ये माया से जाहिर हुई एक एक .II 19 II 
हवासो बदन जो भी पैदा हुए -ये माया के बाइस हुवैदा हुए , 
जो सुख दुख का होता है अहसास सब -ये अहसास है आत्मा के सबब .II 20 II 
कि माया में जब आत्मा हो मकीं -गुनों से हो माया के लज्जत गुजीं , 
गुनों से जो आलूद हो बेशो कम -बुरी या भली जों में ले जनम .II 21 II 
महापुरुष तन में जो है जल्वागर-वो परमात्मा है ,खुदा ,ईश्वर , 
वो नाजिर भी है कार फरमा भी है -वो लज्जत गुजीं भी सहारा भी है .II 22 II 
अगर आत्मा को कोई जान ले -गुनों और माया को पहचान ले , 
रहे जैसे चाहे वो जिस हाल में -न आये तनासुख के जंजाल में .II 23 II 
कोई ध्यान से मन में डाले नजर -तो देखे वो खुद आत्मा जल्वागर, 
कोई सांख्य के योग से देख ले -कोई देख ले कर्म के योग से .II 24 II 
मगर इनसे है बेखबर भी कई -करें सुन सुना कर वो पूजा मेरी , 
जो सुन लें उसी में वो सरशार हों -फना के समंदर से भी पार हों .II 25 II 
मिले खेत से खेत का राजदां-तो अर्जुन उसीसे हो सब कुछ अयां ,
किसी में है जुम्बिश ,किसी में कयाम -इसी मेल से पाए हस्ती तमाम .II 26 II 
जो है कुछ नजर तो ,उसी की नजर -नजर में रहे जिसकी परमेश्वर ,
है सब ग्यान वालों में ग्यानी वही -कि फानी में है ,गैर फानी वही.II 27 II 
जो उस जाते -मुतालिक पे रक्खे यकीं -कि हर एक मकां में वही है मकीं ,
करे वो न खुद आत्मा को तबाह -कि उत्तम गति कि ये अच्छी है राह .II 28 II 
जो समझे कि दुनिया की सब रेलपेल -है माया का करतब ,माया का खेल ,
है खुद आत्मा पुर सुकूं,बे अमल -नजर है उसीकी ,नजर बे खलल .II 29 II 
जिसे आये कसरत में ,वहदत नजर -कि हर रंग में है वही जल्वागर ,
जो वहदत से कसरत का समझे जहूर -खुदा से हो वासिल वही बिल्जरूर .II 30 II 
मकीं तन के अन्दर है परमात्मा -अनादि ,गुनों से बरी ,लाफना ,
अमल से वो फारिग है ,कुंती के लाल -अमल से न आलूद हो लायजाल.II 31 II 
है आकाश दुनिया पे जैसे मुहीत -मुजल्ला ,मुसफ्फा ,कि है वो बसीत ,
बदन में यूँही आत्मा है मकीं -मगर उस से आलूदा होती नहीं .II 32 II 
हो सूरज से जिस तरह रोशन जहां -चमक जाएँ भारत जमीं आसमां ,
इसी तरह खेतों पे छा जाए नूर -जो हो खेत के राजदां का जहूर .II 33 II 
जो चश्मे बसीरत से करता है गौर -कि खेत औरहै ,राजदां इसका और ,
जो माया से ,दे हस्तियों को निजात -बुलन्दी में हासिल करे वस्ले-जात .II 34 II 


-तेरहवां अध्याय समाप्त -




















Wednesday, July 06, 2011

बारहवां अध्याय :भक्तियोग


भक्तियोग -तरीकते इश्क - 

अर्जुन का सवाल - 


जो इस तरह भक्ति में सरशार है-फकत आपके ही परस्तार हैं 
.वो योगी हैं बेहतर ,कि बातिन परस्त -खफी लम यजल ,जाते आली में मस्त .II 1 II 


भगवान ने कहा -


हुए सुन के भगवान यूँ गुल फिशां -हैं बेहतर वही योग में बेगुमां, 
यकीं से जो भक्ति करें मुस्तकिल -मुझी से जो अपना लगाते हैं दिल.II 2 II 
मगर जो पूजें खफी पाक जात -जो कायम है ,दायम है और पुर सबात, 
ख्यालो ,जहूरो ,बयां से बुलंद -हो हाजिर है ,नजीर है और बेगुजंद .II 3 II 
हवास अपने काबू में रक्खें तमाम -सुकूनो -तवाजन हो दिल में मुदाम ,
हरेक की भलाई से मसरूर हों -मुझी से हों वासिल ,न तहजूर हों .II 4 II 
जो जाते खफी से लगाते हैं दिल -उठाते हैं तकलीफ वो मुस्तकिल ,
कि जाते खफी का है ,मुश्किल शुहूद -खफी को न समझेंगे अहले वुजूद .II 5 II 
जो एमाल सब मुझ पे कुरबां करें -परस्तिश मेरी बा दिलो -जां करें ,
जो मकसूदे आली मुझी को बनाएं -फकत मेरे ही ध्यान में दिल लगायें .II 6 II 
मैं करता हूँ ,अर्जुन उन्हें कामगार -तनासुख के फानी समंदर से पार , 
दिल अपना जो मुझ में लगाते रहें -मुझी से निजात अपनी पाते रहें .II 7 II 
लगाए तो दिल ,अपना मुझ में लगा -मुझी में तू कर मह्व अक्ले रिसा , 
तो फिर इसमे हरगिज नहीं कुछ कलाम -तू पायेगा मुझ में कयामो -दवाम .II 8 II 
जो कायम न तू रख सके मुझ में दिल -न यकसू रहे ध्यान में मुस्तकिल , 
तू अभ्यास से कर तलाशे -कमाल ,-इसी योग से ढूँढ़ अर्जुन विसाल.II 9 II 
तू अभ्यास के न हो काबिल अगर -तो फिर मेरी खातिर सब एमाल कर , 
मेरे वास्ते ही जो आमिल हो तू -तो आमाल से मर्दे-कामिल हो तू .II 10 II 
रियाजत में भी गर तू हेठा रहा -तो ले फिर मेरे योग का आसरा , 
तू रख दिल पे काबू ,किये जा अमल -किये जा अमल ,छोड़ दे इनका फल .II 11 II 
कि अफजल है अभ्यास ,करने से ज्ञान -मगर ज्ञान से बढ़ के होता है ध्यान , 
है तर्के-समर ,ध्यान से भी फुजूँ -कि तर्के समर से हो फ़ौरन सुकूं .II 12 II 


वो इंसां जो सुख दुख में हमवार है -जो हर इक का हमदर्द गमख्वार है ,
किसी का न बैरी हो ,बख्शे कुसूर -खुदी से भी दूर और तअल्लुक से दूर .II 13 II 
वो योगी जिसे खुद पे है इख़्तियार -जो साबिर है ,और अज्म में इस्तिवार ,
दिलो -अक्ल जो मुझ पे कुर्बां करे -वही है मेरा भक्त प्यारा मुझे .II 14 II 
जो दुनिया को आजार देता नहीं -जो दुनिया से आजार लेता नहीं ,
बरी बुग्जो -ऐशो -गमो -खौफ से -वही है मेरा भक्त प्यारा मुझे.II 15 II 
जो चौकस है ,बेलाग और बेनियाज -दुखों से मुबर्रा और पाकबाज ,
जो तर्के जजा इब्तिदा से करे -वही है मेरा भक्त प्यारा मुझे.II 16 II 
मुसर्रत से भी दूर ,नफ़रत से भी दूर -गमो ख्वाहिशो -नेको -बद से नफूर .
हमेशा जो भक्ती में शादां रहे -वाही है मेरा भक्त प्यारा मुझे.II 17 II 
बराबर जिसे दोस्त दुश्मन तमाम -न सुख दुख न इज्जत न दौलत से काम ,
हो सर्दी कि गरमी जिसे एकसी -लगन हो न जिसकी किसी से लगी .II 18 II 
बराबर हों जिसके लिए मदहो जम -वो कम गो न जिसको गमे बेशो-कम ,
कवी दिल का ,आजाद घरबार से -वही है मेरा भक्त प्यारा मुझे .II 19 II 
जो करते हैं कायम ,ये अमृत सा धर्म -यकीं से जो रखते हैं ,सीनों को गर्म ,
जो मकसूदे आला समझ लें मुझे -वाही भक्त है सबसे प्यारा मुझे .II 20 II 


-बारहवां अध्याय समाप्त -










Tuesday, July 05, 2011

ग्यारहवां अध्याय :विश्वरूप दर्शन


विश्वरूप दर्शन -जलाले यज्दानी-
अर्जुन ने कहा - 
कहा फिर ये अर्जुन ने अय मोहतरम -किया आपने मुझपे लुत्फो करम , 
बताया खफी अध्यात्म का राज -गया मोह ,आखें हुई सिल की बाज .II 1 II 
कमलनैन मैंने सुना आपसे -कि एहसाम किस तरह पैदा हुए , 
जो पैदा हुए होंगे क्योंकर फना -तुम्हीं को है अजमत ,तुम्हीं को बका .II 2 II 
किया आपने हाल जो कुछ बयां-वही सच है परमेश्वर बेगुमां, 
है पुरुषोत्तम अब इश्तियाक इस कदर -कि दीदारे हक़ देख लूँ इक नजर .II 3 II 
प्रभू आपका है अगर ये ख्याल - कि दर्शन की है मुझको ताबो मजाल ,
तो योगेश्वर ,लुत्फ़ फरमाइए -मुझे लाफना रूप दिखलाइये .II 4 II 
भगवान ने फरमाया -
कर अर्जुन नजर ,देख मेरे सरूप -मेरे सैकड़ों और हजारों हैं रूप ,
मेरी पाक हस्ती के नीरंग देख -नए रूप देख ,और नए ढंग देख .II 5 II 
वसू ,रूद्र ,आदित्य की सूरतें -दो अश्विन भी ,मारुत की भी मूरतें ,
तू भारत के फरजंद सब देख ले -जो देखा नहीं तूने अब देख ले .II 6 II 
जो कुछ चाहे तू देख तन में मेरे-जहाँ सब है ,अर्जुन बदन में मेरे , 
यहीं सारा आलम नमूदार देख -तू साकिन भी देख और सय्यार देख .II 7 II 
मेरी दीद गर तुझको मंजूर है -तेरी आँख का कब ये मकदूर है , 
मैं देता हूँ तुझको खुदायी बसर-मेरे इस शही योग पर कर नजर .II 8 II 
संजय का बयान - 
महाराज ,अर्जुन से कह कर ये बात -हरी ,यानि योगेश्वर पाक ज़ात , 
दिखाने लगे शाने आली का रूप -तो अर्जुन ने देखा खुदायी सरूप .II 9 II 
अनेक उसकी आँखें तो चहरे अनेक -निगाहें अनेक ,उसमे जल्वे अनेक ,
अनेक उसके पुरनूर जेवर सजे -खुदायी वो हथियार उभरे हुए .II 10 II 
खुदायी वो कंठे ,खुदायी लिबास -खुदायी उबटने,खुदायी वो वास ,
वो ला इन्तहाई खडी रूबरू -जो रुख उसका देखे तो रुख चार सू .II 11 II 
फलक पर निकल आयें सूरज हजार -बयक वक्त मिलकर हैं सब नूरबार ,
तो धुंधली सी समझो तुम इसकी मिसाल -महा आत्मा का था ,इतना जलाल .II 12 II 
जो अर्जुन ने देखा कि जल्वानुमा -है देवताओं का वो देवता ,
उसी के तने -पाक में है अयाँ-गिरोहों के गोलों में सारा जहां .II 13 II 
तो अर्जुन को इस दर्जा हैरत हुई -कि सहमा ज़रा और लगी कपकपी ,
हुजूरे खुदावंद में सर झुका -वो यूं जोड़ कर हाथ कहने लगा .II 14 II 
-अर्जुन की मुनाजात -
तुम्हारे पैकर में देव भगवन ,ये देवता सब समा रहे हैं ,
अनेक रंगों में जीव सारे गिरोह बन बन के आ रहे हैं ,
कमल के आसन पे आप ब्रह्मा विराजमान हैं तुहारे अन्दर ,
ऋषी ये सारे ,नाग आसमानी ,सब अपनी सूरत दिखा रहे हैं .II 15 II 
नेक बाजू ,अनेक चहरे ,शिकम अनेक ,और अनेक आँखें ,
अनंत रूपी तुम्हारे जल्वे ,दशों दिशाओं में छा रहे हैं ,
तुम्हारा अव्वल है और न आखिर ,न दरमियां है कोई तुम्हारा ,
हे विश्व रूपी जहाँ के मालिक ,तुम्हीं में आलम समा रहे हैं.II 16 II 
मकुट है पुरनूर ,गुर्ज पुरनूर ,और इस पे चक्कर है शोला अफशां , 
चमक रहे हैं ,दमक रहे हैं ,जहां को भी जगमगा रहे हैं , 
हो जिस तरह आग ,शोला अफशां ,हो जैसे सूरज का रूए ताबां , 
वो अपनी ला इंतहा चमक से ,जहाँ को खीरा बना रहे हैं .II 17 II 
तुम्हीं हो बरतर भी ,ला फना भी ,तुम्ही सजावारे इल्मो इरफां ,
तुम्हीं हो बे इख्तिता में मख्जन,वो जिसमे आलम समा रहे हैं ,
तुम्हीं कदीमी पुरुष हो भगवन,पुरुष वो जिसको फना नहीं है ,
जो लाफाना धरम है ,उसे भी तुम्हारे अहसां बचा रहे हैं .II 18 II 
न इब्तिदा है ,न इंतिहा है ,न वस्त से वास्ता है तुमको, 
तुम्हारे ला इंतिहा हैं बाजू ,जो जोरे ताकत दिखा रहे हैं , 
तुम्हारी आँखें चाँद सूरज ,तुम्हारा चेहरा हवन की अगनी . 
तुम्हारे जल्वे हैं शोला अफशां ,जो कुल जहां को तपा रहे हैं .II 19 II 
जमीं में जल्वा,समां में जल्वा,और उनके अन्दर खला में जल्वा , 
दशों दिशाओं में ,ईश्वर सब तुम्हारे जल्वे समा रहे हैं , 
महात्मा है तुम्हारी सूरत ,वो जिस से बरसे जलालो हैबत , 
कि तीनों दुनिया के रहने वाले ,लरज रहे ,थरथरा रहे हैं II 20 II 
ये देवताओं के गोल सारे ,तुम्हीं में सब हो रहे हैं शामिल , 
तमाम हैबत से हाथ बांधे ,तुम्हारे गुण गुनगुना रहे हैं , 
तुम्हारी स्वस्ति पुकारते हैं ,महारिशी और सिद्ध मिलकर , 
तुम्हारी तारीफ़ गा रहे हैं ,तुम्हारे नगमे सुना रहे हैं .II 21 II 
वो रूद्र ,आदित्य और वसु सब ,वो साध्या और विश्व अश्वां,
तमाम महबूत हो रहे हैं ,निगाह को हैरत में ला रहे हैं ,
गिरोह पितरों के और मारुत ,वो यक्ष ,गन्धर्व राक्षस सब ,
गिरोह सिद्धों के मिल मिलाकर सभी अचम्भे में आ रहे हैं .II 22 II 
हजारों चहरे ,हजारों आँखें ,हजारों बाजू ,हजारों जानू , 
शिकम हजारों ,कदम हजारों ,बला के दंदां डरा रहे हैं , 
तुम्हारा बेअंत रूप वो है कि हे शहंशाहे जोरो -ताकत , 
मैं खुद भी कांपता हूँ ,जहां भी सब थरथरा रहे हैं .II23II
तुम्हारा ये पुर जलाल कामत जो आसमां से लगा हुआ है , 
अनेक रंग उस पे छा रहे हैं ,जो जैबो जीनत बढ़ा रहे हैं , 
फराख चेहरा खुला हुआ मुंह बड़ी बड़ी शोलावार आँखें , 
न मुझमे ताकत न चैन ,विष्णु ,ये मेरे मन को डरा रहे हैं .II 24 II 
तुम्हारी दाढ़ें उभर रही हैं ,कि आग महशर की जल रही है , 
फना के शोले निकर रहे हैं ,जो इक जहां को जला रहे हैं , 
मेरा सहारा है न ठिकाना ,करम हो मुझपर ,करम हो मुझपर , 
तुम्हारे साए में सारे आलम ,सरों को अपने झुका रहे हैं .II 25 II 
वो धृष्ट राष्ट्र के बेटे ,और उनके साथी जहां के राजा , 
पितामा भीषम ,औ द्रोनाचारज ,वो कर्ण रथवान आ रहे हैं , 
हमारी जानिब के ऊंचे अफसर ,सिपाहसालार नामवाले , 
तम्हारे कालिब में आ रहे हैं ,तुम्हारे तन में समां रहे हैं.II 26 II 
तुम्हारे खूंखार मुंह के अन्दर हैं ,सफ ब सफ हौलनाक दाढ़ें, 
मैं देखता हूँ कि,अहले आलम सब अपनी हस्ती मिटा रहे हैं . 
पहुँच कर जबड़ों की चक्कियों में ,सर उनंके पिस कर हुए हैं चूरा , 
खला में दांतों के इनमे अक्सर फंसे हुए लड़खड़ा रहे हैं .II 27 II 
दहन तुम्हारे चमक रहे हैं ,और उनमे यूं कौंधते हैं शोले ,
जहां के सब शूरवीर ,खुद को ,उन्हीं के अन्दर गिरा रहे हैं ,
वो इस तरह जा रहे हैं ,कि जैसे नदियों के तेज धारे,
किसी समंदर के मुंह के अन्दर सब अपनी हस्ती मिटा रहे हैं .II 28 II 
दहन के शोलों में कूदते हैं ,ये तेज रफ़्तार लोग सारे ,
फ़िदा सभी तुम पे हो रहे हैं ,ये मौत के मुंह में जा रहे हैं ,
नहीं ये इन्सां ,ये हैं पतंगे जो इश्को -मस्ती में वालिहाना ,
अजल के शोलों पे उड़ रहे हैं ,फ़ना से जो लौ लगा रहे हैं .II 29 II 
मजे से लब अपने चाटते हो तुम ,इक जहाँ को निगल निगल कर ,
जुबां से शोले निकल रहे हैं ,हरेक को लुक्मा बना रहे हैं ,
तुम्हारी ताबो -तपिश से विष्णु ,तमाम आकाश है दहकता ,
तुम्हारी किरनों के तेज जल्वे ,जमाने भर को जला रहे हैं .II 30 II 
हो देवताओं के देवता तुम ,तुम्हें नमस्कार ,कुछ बता दो ,
तुम्हारी इस पुर जलाल सूरत में किसके जल्वे समां रहे हैं ,
तुम्हारी हस्ती अजल से पहले ,बताओ मुझको कि कौन हो तुम ,
ये कैसे इसरार हैं तुम्हारे ,जो मुझको हैरां बना रहे हैं .II 31 I
-अर्जुन की मुनाजात ख़त्म -
भगवान का इरशाद - 
कजा हूँ मैं ,कजा हूँ मैं -कि दर पाए फना हूँ मैं , 
जहाँ की हस्तो बुद को -मिटने आ रहा हूँ मैं , 
ये शूरवीर लश्करी -जो मिल रहे हैं जंग पर , 
तो न हो ये सबके सब -हलाक कर चुका हूँ मैं .II 32 II 
तू अर्जुन उठ हो नेकनाम -दुश्मनों को घेर कर , 
ब जोर छीन ताजो तख़्त -हमसरों को जेर कर , 
ये मर चुके ,ये मर चुके -फ़ना मैं इनको कर चुका , 
तू बाएं हाथ वाले उठ -वसीला बन ,न देर कर.II 33 II 
मैं कर्ण भीष्मऔर द्रोण -इन्हें हलाक़ कर चुका ,
ये जयद्रथ ,ये जंगजू -समझ हरेक मर चुका ,
तू जीत जायेगा न डर-उदू से अपने जंग कर ,
तू मार इन्हें ,ये मर चुके -सफ़र जहाँ से कर चुके.II 34 II 
संजय ने कहा -
सुनी जब ये गुफ्तार भगवान की-लगी साहबे ताज को कपकपी ,
जुबां लड़खड़ाई गला रुक गया -झुका ,जोड़कर हाथ कहने लगा .II 35 II 
-अर्जुन की मुनाजात -2 .
ज़माना करता है अय ऋषिकेश ,जिसकी हम्दो सना तुम्हीं हो , 
ख़ुशी से गाते हैं गुन तुम्हारे ,कि सबके परमात्मा तुम्हीं हो . 
तम्हीं से डर डर के राक्षस सब ,दशों दिशाओं में भागते हैं , 
करें नमस्कार सिद्ध मिलकर ,जिसे वो सबके खुदा तुम्हीं हो .II 36 II 
बड़े हो ब्रह्मा से मरतबे में ,कि खुद ही ब्रह्मा के तुम हो मूजिब ,
करें नमस्कार क्यों न सारे कि जाते- ला इंतिहा तुम्हीं हो ,
तुम्हीं हो सत भी तुम्हीं असत भी ,तुम्हीं हो नित भी तुम्हीं अनित भी ,
जगन्निवास और महात्मा तुम देवों के देवता तुम्हीं हो.II 37 II 
तुम्हीं हो बरतर खुदाए अव्वल ,पुरुष कदीमी ,पनाहे आलम ,
तुम्हीं सजावारे इल्मो इरफां,अलीमे राज आशना तुम्हीं हो ,
तुम्हीं से फैला जहान सारा ,तुम्हीं हो सबका मुकामे अफजल ,
है जिस से भरपूर सारी दुनिया ,अनंत रूपी खुदा तुम्हीं हो .II 38 II 
तुम्हीं जहां के हो बाप दादा ,तुम्हीं हो ब्रह्मा तुम्हीं हो यम भी , 
तुम्हीं वरुण हो तुम्हीं हो अगनी ,तुम्हीं हो चाँद और हवा तुम्हीं हो , 
तुम्हें नमस्कार ,फिर नमस्कार ,फिर नमस्कार ,मेरे दाता, 
तुम्हें नमस्कार हों हजारों ,खुदाए इज्जो -अला तुम्हीं हो .II 39 II 
तुम्हें नमस्कार हाजिराना ,तुम्हें नमस्कार गायबाना ,
तुम्हें नमस्कार हर तरफ से कि कुल में जल्वानुमा तुम्हीं हो ,
तुम्हारी कुव्वत की कोई हद है न जोरो ताकत की इंतिहा है ,
तुम्हीं से कायम है सारा आलम ,कोई नहीं दूसरा ,तुम्हीं हो .II 40 II 
कभी कहा मैंने कृष्ण तुमको ,कभी कहा मैंने दोस्त यादव ,
मैं बेतकल्लुफ यही समझता रहा कि यार -आशना तुम्हीं हो ,
इसे समझ लो मेरी मुहब्बत ,इसे समझ लो मेरी जहालत ,
न पहले अफसोस ,मैंने समझा कि शाहे अर्जो-समां तुम्हीं हो .II 41 II 
जो बैठते ,उठते खाते पीते ,जो जागते सोते खेलते में ,
हुई हों गुस्ताखियाँ तो बख्शो कि जाते -ला इंतिहा तुम्हीं हो ,
कभी अकेले ,कभी सभा में ,कहा हो कुछ दिल्लगी में तुमको ,
तो पुरखता की खता को बख्शो ,कि हस्तीए बेखता तुम्हीं हो .II 42 II 
हैं जितने साकित ,हैं जितने सय्यार सभी जहानों के हो पिता तुम , 
तुहीं को शायां है सारी इज्जत ,कि मुर्शिदो -रहनुमा तुम्हीं हो, 
नहीं तुम्हारी मिसाल कोई ,किसे फजीलत है तुम से बढ़कर, 
न जिसकी ताकत का तीनों आलम में है कोई दूसरा ,तम्हीं हो.II 43 II 
इसीलिए सिजदा कर रहाहूँ तुम्हारे आगे झुकाए सर को ,
कि जिसको जैबा है सिजदा करना ,फकत मेरे किब्रिया तुम्हीं हो ,
पिदर नवाजिश करे पिसर पर ,सजन सजन पर ,पिया पिया पर ,
दया करो तुम भी मुझ पे भगवन ,कि बह्रे -लुत्फो -अता तुम्हीं हो.II 44 
तुम्हारा मैंने वो रूप देखा न जिसको देखा था मैंने पहले ,
मैं खुश भी हूँ ,और मैं गमजदा भी ,मुकामे बीमो -रजा तुम्हीं हो ,
मुझे दिखादो ,मुझे दिखादो ,वही वो पहले सी अपनी सूरत ,
जगन निवास ,अब दया हो मुझ पर कि देवों के देवता तुम्हीं हो.II 45 II 
मुकुट लगाया हो ,गुर्ज उठाया हो ,हाथ में हो तुम्हारे चक्कर ,
वो रूप पहले सा देख लूँ मैं ,कि देर से आशना तुम्हीं हो ,
दया करो मुझपे ,फिर दिखाओ वो मूरती चार हाथों वाली ,
तुम्हारे हैं गो हजार बाजू ,कि विश्वरूपी खुदा तुम्हीं हो .II 46 II 
-अर्जुन की दूसरी मुनाजात ख़त्म -


-भगवान ने फरमाया - 
सुन अर्जुन अब मेरी दया कि,ये तुझ पे बिल्जरूर है , 
कि मैंने अपने योग से ,दिखा दिया जहूर है , 
न जिसको देखा आजतक ,किसीने भी तेरे सिवा , 
वो अव्वलीं ,वो दायमी ,ये विश्वरूप नूर है .II 47 II 
कुरु के खानदान में ,मिली है तुझको सरवरी , 
दिखाया तुझको अपना रूप ,है ये बन्दा परवरी , 
न वेद,जप से मिल सके ,दान तप से मिल सके , 
न यग ,न कर्मकांड से ,दिखायी दे सके हरी .II 48 II 


हिरासो खौफ छोड़ दे ,न जार हो ,न जार हो ,
न हौलनाक रूप से ,मेरे तू बेकरार हो ,
ले मेरी शक्ल देख ले ,तू जिस से आशना भी है ,
ये वहमो खौफ दूर कर ,ख़ुशी से हमकिनार हो .II 49 II 
संजय ने कहा -
ये कहकर महा आत्मा ने वहीँ -दिखाई वही पहली सूरत हसीं ,
गया खौफ ,सब आन की आन में -तसल्ली से जान आ गई जान में.II 50 II 


अर्जुन का इकरार -
जो अर्जुन ने देखा ,तो भगवान की-वही पहली सूरत थी इंसान की ,
कहा अब मेरा दिल ठिकाने लगा -मुझे होश भगवान आने लगा .II 51 II 
भगवान का इरशाद -
फिर अर्जुन से भगवान कहने लगे -कि,तूने जो अब मेरे दर्शन किये ,
सदा देवताओं का अरमां रहा -ये दर्शन कहाँ उनको हासिल हुआ .II 52 II 
मुझे तूने देखा है ,जिस तौर से -यही तौर मुमकिन नहीं और से ,
ये दीदार यग से ,न तप से मिले -न दान और वेदों के जप से मिले .II 53 II 
अगर मेरी भगती में यकसू रहे -मेरा ज्ञान हो ,और मुझे देख ले ,
हकीकत का इरफां भी हासिल हो फिर -मेरी जाते -आली में वासिल हो फिर II 54 II 
मेरा भक्त हर काम मेरा करे -तअल्लुक किसी से ,न नफ़रत उसे ,
करे मुझको मकसूद अपना ख्याल -तो अर्जुन वो पाए मुझी से विसाल .II 55 II 


-ग्यारहवां अध्याय समाप्त -














































Monday, July 04, 2011

दसवां अध्याय :विभूति योग


विभूति योग -जलाले यज्दानी 
भगवान का इरशाद 
सुखनसंज भगवान फिर यूं हुए -कि सुन अय कवी -दस्त प्यारे मेरे , 
ये आला सुखन फिर बताता हूँ मैं -भलाई का रस्ता फिर दिखाता हूँ मैं .II 1 II 
हुए देवता महारिशी जिस कदर -मेरी इब्तदा से हैं बेखबर , 
मुझी से है सब देवताओं कि बूद-मिला मुझसे हर महारिशी को वुजूद .II 2 II 
समझता है मुझको जो बे इब्तदा -जनम से बरी ,शाहे अरजो -समा , 
फरेबे नजर से वही पाक है -गुनाहों से आजाद औ बेबाक है .II 3 II 
मुझी से है सुख दुख,दिलेरी ,हिरास -खिरद ,इल्मे कल्ब -हकीकत शनास , 
सदाकत ,सुकूं,ज़ब्त ,उफू औ करम -मुझी से वुजूद ,और मुझी से अदम .II 4 II 
अहिंसा ,कनाअत ,दिले पुर सुकूं - रियाजो सखा ,नामे नेक औ जुबूं , 
गरज जानदारों में जो हैं सिफात -है उन सबकी बिना मेरी पाक ज़ात .II 5 II 
वो सालों मुआज्जिज ऋषि नामदार -मनू और वो चारों कदीमी कुमार , 
जहां वाले सब जिनसे पैदा हुए -वो मेरे ही मन से हुवैदा हुए .II 6 II 
जो कुव्वत मेरे योग की जान ले-हकीकत मुजाहिर की पहचान ले , 
वो कायम रहे योग पर बिल्यकीं-तवाज़न है उसमे तजल्जल नहीं .II 7 II 
मेरी ज़ात है मिब्नाए कायनात -मुझी से हुआ इरताकाए -हयात , 
यकीं इस पे करते हैं ,जो अहले होश -करें मेरी भगती बजोशो खरोश .II 8 II 
मुझी में हैं मन को जमाये हुए -हैं प्राण अपने मुझमे लगाए हुए , 
वो करते हैं आपस में पुरनूर दिल -मेरे ज़िक्र से शादो -मसरूर दिल .II 9 II 
वो रहते हैं यकदम मेरे जौक से -वो करते हैं पूजा मेरी शौक से , 
मैं देता हूँ उनको वो दानिश का योग -की हो जाते हैं मुझसे वासिल वो लोग .II 10 II 
जो रहम उनकी हालत पे खाता हूँ मैं -तो घर उनके दिल में बनाता हूँ मैं ., 
दिखाता हूँ उनको हिदायत का नूर -अन्धेरा जहालत का हो जिस से दूर .II 11 II 
अर्जुन ने कहा - 
तू आली खुदा ,तेरा आली मुकाम -वो हस्ती है तू ,जिसकी अज़मत मुदाम . 
तू माबूदे अव्वल ,तेरी पाक जात -जमम से बरी ,मालिके कायनात .II 12 II 
इसी तरह लें आपके पाक नाम -असित ,व्यास ,देवल ,ऋषी भी तमाम , 
यही देव नारद बताएं सिफात -यही आप अपनी सुनाएँ सिफात .II 13 II 
गरज आपने जो बताया मुझे -यकीं केशौ भगवान आया मुझे , 
न समझा कोई आपकी शान को -कोई देवता हो ,कि शैतान हो .II 14 II 
ऐ खालिक जगत के और ए किब्रिया -सभी देवताओं के हो देवता , 
पुरुषोत्तम ऊंची है बात आपकी -अगर बात जानें ,तो ज़ात आपकी.II 15 II 
करें आप मुझपर मुकम्मिल अयां-जलाले मुक्कदस का वाजिह निशां,
जहां फैज़ से जिसके मामूर है-जमीनों -जमां जिस से पुर नूर है .II 16 II 
बता दीजिये मेरे योगी ज़रा -मिले ध्यान से कैसे ज्ञान आपका ,
करूं किन मुजाहिर में जम कर ख्याल -कि खुल जाए मुझपर हकीकत का हाल .II 17 II 
ज़रा योग अपना बयां कीजिए -जलाल अपना भगवन अयां कीजिए ,
कि बातें वो अमृत सी हैं आपकी -तबीयत नहीं सैर होती कभी .II 18 II 
भगवान का इरशाद - 
हुए सुन के भगवान यूं लबकुशा -हैं अर्जुन मेरे वस्फ़ ला इंतिहा , 
जलाल अपना कुछ कुछ बताता हूँ मैं -सिफ़ाते -नुमायाँ दिखाता हूँ मैं .II 19 II 
सुन अर्जुन हूँ मैं आत्मा बिल्यकीं-जो है जानदारों के दिल में मकीं , 
हूँ मैं मिस्ले जां,अहले जां में निहां -मैं अव्वल ,मैं आखिर ,मैं हूँ दरमियां.II 20 II 
आदित्तियों में है मेरा "विष्णु "खिताब -मैं अश्याये पुर नूर में आफताब , 
"मरीची "मरूतों के अन्दर हूँ मैं -मनाजिल में तारों के "चंदर "हूँ मैं .II 21 II 
समझ मुझको वेदों में तू वेद साम -मेरा देवताओं में "वासु "है नाम ,
हिसों में हूँ मैं मन ,मुझको पहचान तू -तू जां अहले जां की मुझे जां तू .II 22 II 
मैं रुद्रों के अन्दर हूँ "शंकर "दिलेर -जो हैं राक्षस ,यक्ष उनमे कुबेर ,
तो वसुओं में अग्नी ,मुझे तू समझ -सब ऊंचे पहाड़ों में मेरू समझ .II 23 II 
पुरोहित हैं जो ,उनमे ब्रहस्पत हूँ मैं -सुन अर्जुन कि सर करदा प्रोहित हूँ मैं ,
सिकंद अहले लश्कर के अन्दर कहो -तो झीलों के अन्दर समंदर कहो .II 24 II 
भृगू यानी ऋषियों का सरदार हूँ -सुखन में सुखन यानी ओंकार हूँ ,
यगों में हूँ जप यग ,निराला हूँ मैं -जो मुहकम हैं ,उनमे हिमाला हूँ मैं .II 25 II 
दरख्तों में पीपल का हूँ में दरख़्त -मैं ऋषियों में नारद ,अय नेकबख्त ,
हूँ गन्धर्व लोगों में चितरथ मैं -कपिल हूँ मुनी उनमे जो सिद्ध हैं .II 26 
मैं घोड़ों में इन्दर हूँ अस्पेनर -जो अमृत के मंथन में आया नजर ,
मैं फीलों के अन्दर हूँ इन्दर का फील -जो इंसान हैं उनने शहे-बेनदील.II 27 II 
मैं आलाते जंगी में बर्के -तपां-मैं गायों में हूं कामधुक बेगुमाँ,
शहंशाह नागों का मैं वासुकी -हूँ कंदर्प जिस से हों पैदा सभी .II 28 II 
मैं नागों में हूँ शेष लाइन्तिहा -मैं जल वासियों में वरुण देवता ,
मैं पितरों में हूँ अर्यमा जी हशम-मैं दुनिया के फर्मा-रवाओं में यम .II 29 II 
मैं हूँ देत्याओं में पहलाद सुन -मैं वक्त उनमे रखें जो गिनती का गुन,
मैं शेरे बबरसब दरिंदों में हूँ -तो विष्णू का शाही परिंदों में हूँ .II 30 II 
मैं सरसर हूँ उनमे जो हैं तेजगाम -मैं हूँ तेगो शमशीर वालों में राम , 
मुझे मछलियों में मकर जान तू-तो नहरों में गंगा मुझे मान तू.II 31 II 
मैं आगाज़ ओ अंजाम अहले जहां -जो कुछ दरमियाँ है तो मैं दरमियाँ , 
मैं इल्मों में हूँ इल्मे जां अय अकील -दलीलों में अर्जुन मैं हक़ की दलील .II 32 II 
अलिफ़ हूँ ,सुखन जो करे इब्तदा -मैं हूँ अत्फ़ ,लफ्जों के जो दे मिला , 
मैं हूँ वक्त जिसको फना ही नहीं -मुहाफिज हूँ वो जिसका रुख हर कहीं .II 33 II 
कज़ा हूँ जो करती है सबको फना -नयी जिन्दगी की हूँ मैं इब्तदा , 
मैं हूँ सनफे-नाजुक में इकबालो नाम -सुखन ,हाफिजा ,उफू अक्लो कयाम .II 34 II 
सामों में बृहत साम ,अय होशमंद -तो छंदों में गायत्री का मैं छंद , 
महीनों में मुझको अघन कर शुमार -तो मौसम में ,फूलों की हूँ मैं बहार .II 35 II 
जुआ हूँ मैं ,जो चलते हैं चाल -जलाल उनका ,जिनमे है जाहोजलाल , 
इरादा भी मैं ,फतहो नुसरत भी मैं -जो सादिक हैं ,उनकी सदाकत भी मैं .II 36 II 
मैं वृष्णओं हूँ वासुदेव अय मुशीर -कबीले में पाण्डू के अर्जुन अमीर , 
मैं हूँ व्यास ,उनमे हैं जितने मुनी -जो शायर हैं ,उनमे हूँ उशना कवी .II 37 II 
जो हाकिम हैं मैं उनमे ताजीर हूँ -जो फातिह हैं ,मैं उनकी तदबीर हूँ , 
मैं राजों में हूँ ,ख़ामुशी पर्दा पोश -मैं हूँ ज्ञान उनका ,जो हैं इल्मकोश .II 38 II 
करूं खल्के आलम की तरबीज मैं -हूँ अर्जुन हरेक चीज का बीज मैं , 
है साकिन कोई ,याकि सय्यार है -मगर मुझसे बाहर न ज़न्हार है. II 39 II 
परन्तप ,यहाँ गौर कर ले ज़रा -मेरे पास जलवे हैं ला इंतिहा ,
जो थोड़ा सा तुम से बयाँ कर दिया -नमूना सा थोड़ा अयां कर दिया .II 40 II 
नजर आये कुव्वत कहीं या जलाल -शिकोह ,या तजम्मुल कि हुस्नो जमाल ,
समझले कि उसमे है जल्वा फ़िगन -मेरे बेकराँ नूर की इक किरन.II 41 II 
न तफसील में जाके उलझन बढ़ा -कि कसरत से अर्जुन तुझे काम क्या ,
ज़रा ये करिश्मा हुआ है अयां -इसी से मामूर सारा जहां .II 42 

-दसवां अध्याय समाप्त -